‘ज्ञानवान, कर्मों में निपुणता के साथ सदाचार से युक्त व्यक्ति कहलाता है श्रेष्ठ’, पीएम मोदी ने साझा किया सुभाषित

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर श्रेष्ठ व्यक्ति के बारे में एक सुभाषित साझा किया। इस सुभाषित के जरिए बताया गया कि वास्तविक अर्थों में श्रेष्ठता क्या है और इसके लिए मनुष्य में कौन-कौन से गुण होने आवश्यक हैं। प्रधानमंत्री मोदी की ओर से संस्कृत श्लोक, “ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥” साझा किया गया। इसका भावार्थ है कि जो मनुष्य ज्ञानवान्, वाग्मी और कर्मों में निपुण होने के साथ शील एवं सदाचार से युक्त होता है, वही इस संसार में वास्तव में श्रेष्ठ कहलाता है। पीएम मोदी की ओर से साझा किया गया यह श्लोक महाराजा भोज द्वारा रचित सुप्रसिद्ध वास्तुशास्त्र ग्रंथ ‘समराङ्गणसूत्रधार’ के 44वें अध्याय का 16वां श्लोक है। इस श्लोक में एक उत्तम चरित्र और सदाचार के महत्व के बारे में बताया गया है। इस श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि कोई व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा ज्ञानी हो, बहुत अच्छा वक्ता (बोलने में कुशल) हो और अपने काम में पूरी तरह निपुण व निष्ठावान हो, यदि उसमें अच्छा चरित्र (शील) नहीं है, तो वह समाज में आदरणीय या कल्याणकारी नहीं माना जा सकता।” इस श्लोक का भावार्थ है कि समाज में ज्ञान को बहुत बड़ा दर्जा दिया गया है। लेकिन ज्ञानी व्यक्ति के पास अच्छा चरित्र होना भी उतना ही जरूरी है। कई लोग अपनी बातों से किसी को भी प्रभावित कर लेते हैं। लेकिन यदि उनके मन में खोट है और उनका चरित्र साफ नहीं है, तो उनकी मीठी बातें केवल दूसरों को धोखा देने का जरिया बन जाती हैं। इसी तरह अपने काम में माहिर होना और उसे पूरी लगन से करना बहुत अच्छी बात है। लेकिन यदि कोई पेशेवर रूप से बहुत सफल है और उसमें नैतिक मूल्य नहीं हैं, तो यह सफलता अधूरी है।

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