नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इस याचिका में देश भर में मेडिकल योग्यता और रजिस्ट्रेशन के लिए एक समान और धोखाधड़ी-रोधी वेरिफिकेशन सिस्टम बनाने के निर्देश देने की मांग की गई थी।जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने वकील नरेंद्र कुमार गोस्वामी की याचिका खारिज कर दी और उन्हें सुप्रीम कोर्ट में बार-बार PIL दाखिल करने से बचने की सलाह दी।जस्टिस नरसिम्हा की अगुवाई वाली बेंच ने टिप्पणी की, “आप हर हफ़्ते एक PIL दाखिल करते हैं। आप किस तरह की याचिकाएं तैयार करते हैं? आपने इसे एक फ़ैक्ट्री बना दिया है। बस यही है, हर हफ़्ते आप एक रिट याचिका दाखिल करते हैं। जैसे ही कोई ख़बर देखते हैं, आप याचिका तैयार कर लेते हैं। अपनी मांगों को तो देखिए। क्या आप कभी अपना दिमाग भी लगाते हैं?”बेंच ने यह भी सवाल किया कि क्या ऐसी याचिकाएं पब्लिसिटी के लिए दाखिल की जा रही हैं। उन्होंने कहा, “आप ऐसा क्यों करते हैं? सिर्फ़ इसलिए कि रिट याचिका दाखिल करना आसान है और कोई भी इसे दाखिल करके पब्लिसिटी पा सकता है? हमें इस तरह की याचिकाओं से परेशान न करें।खुद पेश हुए गोस्वामी ने समझाने की कोशिश की कि PIL में मेडिकल योग्यता और रजिस्ट्रेशन के वेरिफिकेशन से जुड़े अहम सवाल उठाए गए हैं। उन्होंने कथित फ़र्ज़ी मेडिकल डिग्री के बारे में याचिका में दिए गए आंकड़ों का भी ज़िक्र किया।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और उसे खारिज कर दिया।संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल इस PIL में अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों को लागू करने और नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट, 2019 के तहत कानूनी ढांचे को लागू करने के निर्देश देने की मांग की गई थी।याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में सुरक्षित और कुशल मेडिकल इलाज का अधिकार भी शामिल है और जिन लोगों के पास फ़र्ज़ी, संदिग्ध या बिना वेरिफ़ाई की गई योग्यताएं हैं, उन्हें मेडिकल पेशे में आने या बने रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।याचिका में मेडिकल योग्यता और रजिस्ट्रेशन के लिए एक “भरोसेमंद, ऑडिट-योग्य, धोखाधड़ी-रोधी और उचित प्रक्रिया का पालन करने वाला” वेरिफिकेशन सिस्टम बनाने की मांग की गई थी। इसमें शुरुआती रजिस्ट्रेशन, रिन्यूअल, योग्यता जोड़ने और प्रैक्टिस करने के लाइसेंस को जारी रखने से पहले वेरिफिकेशन शामिल था। इसमें कहा गया था कि नेशनल मेडिकल रजिस्टर सिर्फ़ एक इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस नहीं है, बल्कि एक कानूनी आधार है जिस पर मरीज़, अस्पताल, सरकारी अधिकारी और समाज यह भरोसा करते हैं कि कोई मेडिकल प्रैक्टिशनर सही ढंग से योग्य और रजिस्टर्ड है। याचिका में नकली एजुकेशनल और प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन से जुड़ी कई घटनाओं का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि ऐसे मामले रेगुलेटरी चिंता का विषय हैं।इसमें मई 2025 में हापुड़ की मोनाड यूनिवर्सिटी में उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स की रेड का ज़िक्र किया गया, जहाँ कथित तौर पर 1,372 नकली डिग्रियाँ/मार्कशीट और 262 नकली सर्टिफ़िकेट बरामद किए गए थे; इसके बाद पिछले साल नवंबर में एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) ने भी तलाशी ली थी।याचिकाकर्ता ने केरल पुलिस द्वारा जांचे गए नकली सर्टिफ़िकेट नेटवर्क, दिल्ली एंटी-करप्शन ब्रांच द्वारा जांचे गए नकली फ़ार्मेसी रजिस्ट्रेशन रैकेट और मार्च 2026 में राजस्थान पुलिस स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप द्वारा जांचे गए नकली फ़ॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन सर्टिफ़िकेट और फ़र्ज़ी मेडिकल रजिस्ट्रेशन से जुड़े रैकेट का भी ज़िक्र किया।याचिका में साफ़ किया गया कि याचिकाकर्ता इन मामलों में किसी आपराधिक दोष के फ़ैसले की मांग नहीं कर रहा था, बल्कि यह तर्क दे रहा था कि मेडिकल रजिस्ट्रेशन सिस्टम में मज़बूत वेरिफिकेशन सुरक्षा उपाय शामिल होने चाहिए।याचिकाकर्ता ने 26 फ़रवरी 2026 को केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और नेशनल मेडिकल कमीशन को एक रिप्रेजेंटेशन सौंपा था, और फिर 31 मई 2026 को एक रिमाइंडर भेजा था, जिसमें मेडिकल क्वालिफिकेशन और रजिस्ट्रेशन के वेरिफिकेशन के लिए उपाय करने की मांग की गई थी।याचिका में दावा किया गया कि रिप्रेजेंटेशन का कोई जवाब नहीं मिला और भरोसेमंद वेरिफिकेशन सिस्टम की कमी के कारण उन्हें सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा।याचिकाकर्ता ने किसी व्यक्तिगत रजिस्ट्रेशन को रद्द करने, आपराधिक जांच की निगरानी करने या मेडिकल लापरवाही के दावों पर फ़ैसला करने के बजाय एक स्ट्रक्चरल और प्रिवेंटिव मैंडमस (संरचनात्मक और निवारक आदेश) की मांग की थी। याचिका में यह भी मांग की गई कि कोई भी वेरिफिकेशन, ऑडिट या प्रतिकूल कार्रवाई क़ानून के अनुसार, नोटिस देने, सुनवाई का मौका देने और तर्कपूर्ण आदेश के बाद की जाए, जो वैधानिक उपायों के अधीन हो।