नई दिल्ली। भारत और कनाडा ने सोमवार को यहां प्रस्तावित ‘कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट’ (CEPA) के लिए बातचीत का चौथा दौर शुरू किया। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दोनों देशों का लक्ष्य इस साल के अंत तक इस समझौते को अंतिम रूप देना है।पांच दिनों तक चलने वाली इस बातचीत में जिन मुद्दों पर चर्चा होगी, उनमें सामान और सेवाओं का व्यापार, ‘रूल्स ऑफ़ ओरिजिन’ (उत्पत्ति के नियम) और व्यापार में तकनीकी बाधाएं शामिल हैं। यह दौर जुलाई में ओटावा में हुई बातचीत के तीसरे दौर के बाद हो रहा है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इस साल मार्च में नई दिल्ली में हुई अपनी बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच CEPA के लिए बातचीत पूरी करने का लक्ष्य साल के अंत तक तय किया था। साथ ही, उन्होंने ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्रों में आपसी सहयोग को और गहरा करने पर सहमति जताई थी।दोनों नेताओं के बीच शिखर सम्मेलन के बाद जारी एक संयुक्त बयान के अनुसार, नेताओं ने भरोसा जताया कि एक व्यापक व्यापार ढांचा इस साझेदारी के लिए एक मजबूत आर्थिक आधार का काम करेगा। साथ ही, यह 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को (कनाडाई) $70 बिलियन (4.65 लाख करोड़ रुपये) तक बढ़ाने की साझा महत्वाकांक्षा को भी पूरा करने में मदद करेगा।2024-25 में भारत और कनाडा के बीच सामान का द्विपक्षीय व्यापार $8.66 बिलियन का था, जबकि कनाडा को भारत का निर्यात $4.22 बिलियन तक पहुंच गया था।कनाडा को भारत के निर्यात की प्रमुख वस्तुओं में फार्मास्युटिकल उत्पाद, मशीनरी के पुर्जे और मैकेनिकल उपकरण, लोहा और स्टील का सामान, इलेक्ट्रॉनिक सामान, ऑर्गेनिक रसायन, आभूषण, रत्न और कीमती पत्थर, कपड़े और टेक्सटाइल, समुद्री भोजन, इंजीनियरिंग का सामान और ऑटो पार्ट्स शामिल हैं। कनाडा से भारत के प्रमुख आयात में दालें, उर्वरक, खनिज ईंधन, लकड़ी की लुगदी, रत्न और कीमती पत्थर, विमान के पुर्जे, मशीनरी के पुर्जे और लोहा व एल्यूमीनियम का स्क्रैप शामिल हैं।कनाडा को सेवाओं के निर्यात में भारत के IT सेक्टर का मुख्य योगदान है।प्रधानमंत्री कार्नी की भारत यात्रा ने दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों में उल्लेखनीय सुधार की नींव रखी। इससे पहले, कनाडा के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके पूर्ववर्ती जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में ये संबंध बहुत खराब हो गए थे। ट्रूडो सरकार पर कनाडा में भारत-विरोधी एजेंडा चलाने के लिए सिख चरमपंथियों को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा था।