बिहार : नदियां उतर रही हैं, लेकिन बाढ़ का दर्द बरकरार, घर लौटकर फिर जिंदगी बसाने की चुनौती

पटना। बिहार में कई स्थानों पर अब नदियों का पानी धीरे-धीरे उतरने लगा है, लेकिन बाढ़ प्रभावित परिवारों की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। बाढ़ प्रभावित इलाकों के लोग के कई परिवार तंबू-तिरपाल लगाकर खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। गांवों में पानी घुसने के बाद ये लोग घर का जरूरी सामान लेकर सुरक्षित जगह की तलाश में यहां पहुंचे हैं। अब इनके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि पानी उतरने के बाद वे घर लौटेंगे तो वहां मिलेगा क्या और जिंदगी को फिर से कैसे शुरू करेंगे। मुंगेर के जिला मुख्यालय में पार्क और कलेक्ट्रेट कार्यालय के सामने कई परिवार तंबू-तिरपाल लगाकर खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। छोटे-छोटे तंबुओं में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक दिन-रात गुजार रहे हैं। कई परिवारों के साथ उनके मवेशी भी हैं। ग्रामीणों के लिए पशु सिर्फ जानवर नहीं बल्कि उनकी रोजी-रोटी का बड़ा सहारा हैं। इसलिए घर छोड़ने की मजबूरी के बावजूद वे अपने मवेशियों को साथ लेकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचे हैं। यही कुछ स्थिति पटना के मरीन ड्राइव की है। जहां बाढ़ पीड़ित अपना घर छोड़कर पहुंचे हैं। मुंगेर के जिला मुख्यालय में रह रहे ग्रामीण मुनेश्वर ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि घर में पानी घुसने के बाद जरूरी सामान लेकर यहां आना पड़ा। अभी तो किसी तरह तंबू में रह रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि पानी उतरने के बाद घर लौटेंगे तो घर की क्या हालत होगी। परिवार को फिर से बसाना आसान नहीं होगा। मरीन ड्राइव पर आसरा लिए एक ग्रामीण ने कहा कि बच्चों की पढ़ाई रुक गई है और घर में रखा सामान भी बर्बाद होने की चिंता है। मवेशियों के लिए चारा जुटाना भी मुश्किल है। पानी उतरने के बाद घर की सफाई, मरम्मत और रोजी-रोटी शुरू करने के लिए मदद की जरूरत पड़ेगी। तिरपाल के नीचे रहना इन परिवारों के लिए आसान नहीं है। बारिश होने पर तंबू में पानी आने का डर रहता है। तेज हवा में तिरपाल उड़ने की चिंता बनी रहती है। रात में जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा भी लोगों को परेशान करता है। छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए परिस्थितियां और कठिन हैं। खाने-पीने का सामान, कपड़े और बिस्तर सुरक्षित रखना भी चुनौती बना हुआ है। इन बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि हमारी असली चिंता नदी का पानी उतरने के बाद शुरू होगी। जिस घर के आंगन में बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां कीचड़ जमा है। जिस कमरे में अनाज रखा था, वहां पानी और नमी ने सामान खराब कर दिया है। कई घरों की दीवारें कमजोर हो चुकी हैं। फसल बर्बाद हुई है और अब तो मवेशियों के सामने चारे की समस्या है। यानी बाढ़ ने सिर्फ घर नहीं डुबोए, बल्कि परिवारों की आर्थिक रीढ़ को भी प्रभावित किया है। पानी उतरने के बाद लोगों को घरों की सफाई और मरम्मत के साथ दोबारा रोजी-रोटी शुरू करनी होगी। जिन किसानों की फसल बर्बाद हुई है, उनके सामने अगली फसल के लिए पूंजी जुटाने की चुनौती होगी। मजदूरों के सामने रोजगार का संकट होगा। बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई है। बाढ़ के बाद दूषित पानी और जलजमाव से डायरिया, टाइफाइड, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। बाढ़ प्रभावित लोगों का कहना है कि नदियों का पानी उतर जाएगा, तंबू धीरे-धीरे हट जाएंगे और लोग अपने घरों की ओर लौटेंगे। लेकिन उनके लिए बाढ़ की कहानी वहीं खत्म नहीं होगी। घर दोबारा खड़ा करना, खेतों को फिर तैयार करना, मवेशियों को बचाना और बच्चों की पढ़ाई को पटरी पर लाना- यह सब उस संघर्ष का हिस्सा होगा, जो पानी उतरने के बाद शुरू होगा। आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, विभिन्न नदियों के जलस्तर में हुई वृद्धि के कारण राज्य के 14 जिलों पटना, भोजपुर, सारण, वैशाली, भागलपुर, बेगूसराय, बक्सर, समस्तीपुर, मुंगेर, कटिहार, लखीसराय, खगड़िया, पूर्णिया एवं अरवल के 84 प्रखण्डों में 514 ग्राम पंचायतों के अन्तर्गत लगभग 40.21 लाख जनसंख्या बाढ़ से प्रभावित हुई है।
गृहयुद्ध के बीच सूडान में फैला हैजा, संयुक्त राष्ट्र ने शुरू किया टीकाकरण अभियान

संयुक्त राष्ट्र। संयुक्त राष्ट्र और उसके मानवीय सहायता साझेदारों ने कहा है कि वे सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के बावजूद सूडान में हैजा (कॉलेरा) से निपटने के प्रयास जारी रखे हुए हैं और जरूरतमंद लोगों तक जरूरी सहायता पहुंचा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय (ओसीएचए) ने बुधवार (स्थानीय समयानुसार) बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सहयोग से स्वास्थ्य अधिकारियों ने मंगलवार को उत्तरी दारफुर राज्य के ताविला क्षेत्र में 10 दिन का हैजा टीकाकरण अभियान शुरू किया है। इसका उद्देश्य वहां रह रहे 95,000 विस्थापित लोगों को इस बीमारी से बचाना है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, जून में घोषित किए गए सूडान के हैजा प्रकोप के कारण अब तक छह राज्यों में लगभग 2900 मामले सामने आ चुके हैं और इससे जुड़ी 247 मौतें दर्ज की गई हैं। ओसीएचए ने अपनी दैनिक रिपोर्ट में बताया कि अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम) और उसके सहयोगियों ने हाल ही में ताविला , अल-लैत और उम हजालीज इलाकों में 12,000 लोगों को आपातकालीन आश्रय और रोजमर्रा की जरूरी घरेलू सामग्री उपलब्ध कराई है। रिपोर्ट में आईओएम के हवाले से कहा गया है कि पिछले सप्ताह उत्तरी दारफुर में लगभग 1,300 लोग बढ़ती असुरक्षा के कारण उम बारू इलाके के गांवों से अपना घर छोड़ने पर मजबूर हो गए। यह इलाका सूडान-चाड सीमा के पास स्थित है। बताया गया है कि इनमें से कई लोग सुरक्षा की तलाश में राज्य के अन्य हिस्सों और पड़ोसी देश चाड चले गए। आईओएम के अनुसार, दक्षिण दारफुर राज्य में मंगलवार को ड्रोन से किए गए तीन हमलों ने न्याला शहर के कई स्थानों को निशाना बनाया। वहीं ब्लू नाइल राज्य में सोमवार को बढ़ी असुरक्षा के कारण गीसान क्षेत्र के कई गांवों से 3,300 से अधिक लोग विस्थापित हो गए। यह इलाका सूडान-इथियोपिया सीमा के पास स्थित है। ओसीएचए ने कहा कि दक्षिण और मध्य दारफुर के कुछ हिस्सों में विभिन्न समुदायों के बीच तनाव बढ़ रहा है। हाल के दिनों में वहां कई घातक घटनाएं भी सामने आई हैं। कार्यालय ने एक बार फिर सभी पक्षों से अपील की कि वे आम नागरिकों और नागरिक सुविधाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करें तथा मानवीय सहायता संगठनों को जरूरतमंद लोगों तक तेजी से, सुरक्षित रूप से और बिना किसी रुकावट के पहुंचने दें।
दक्षिण त्रिपुरा: योगमाया काली मंदिर में दुर्गा पूजा की तैयारियां तेज, बंगाल के कारीगर बना रहे मूर्तियां

दक्षिण त्रिपुरा। शारदीय नवरात्रि आने में अब एक महीने का समय बचा है। ऐसे में पूरे त्रिपुरा में दुर्गा पूजा की तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो गई हैं। दक्षिण त्रिपुरा जिले के बेलोनिया शहर में स्थित ऐतिहासिक योगमाया काली मंदिर में भी इस बार दुर्गा पूजा को लेकर खास तैयारी की जा रही है। इस मंदिर में सब-डिविजन की सबसे पुरानी दुर्गा पूजा होती है और हर साल पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ यह त्योहार मनाया जाता है। इस साल पूजा के लिए मूर्तियां बनाने का जिम्मा पश्चिम बंगाल के नबद्वीप से आए 10 कुम्हारों की टीम को दिया गया है। इस टीम की अगुवाई सीनियर कुम्हार रंजीत पाल कर रहे हैं। रंजीत पाल ने गुरुवार को आईएएनएस से बातचीत के दौरान बताया कि वह पश्चिम बंगाल के नबद्वीप के रहने वाले हैं और पिछले 26 सालों से ज्यादा समय से मूर्तियां बनाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “इस बार त्रिपुरा में दुर्गा पूजा के लिए विशेष तौर पर खास मूर्तियां बना रहे हैं। देवी दुर्गा की मूर्तियां पारंपरिक पुरानी शैली में बनाई जाएंगी।” उन्होंने बताया कि एक मूर्ति के लिए उन्हें एक से डेढ़ लाख रुपये मिलते हैं और अभी उनकी टीम 5 मूर्तियां बनाने के काम में जुटी हुई है। कुम्हारों की यह टीम पिछले कई दिनों से दिन-रात मूर्तियों को आकार देने में लगी है। बेलोनिया शहर में स्थित योगमाया काली मंदिर, जिसे योगमाया काली बाड़ी या महामाया काली बाड़ी भी कहा जाता है, क्षेत्र के सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। यह दक्षिण त्रिपुरा के सबसे पुराने काली मंदिरों में गिना जाता है। यहां बंगाली नववर्ष, दुर्गा पूजा और विशेष रूप से दीवाली यानी काली पूजा के अवसर पर बहुत बड़ा मेला और उत्सव आयोजित किया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। बता दें कि वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक मनाया जाएगा।
शेल्टन और अल्काराज का मैच देखने के लिए देर रात तक जगा रहा: अलेक्जेंडर ज्वेरेव

न्यूयॉर्क। जर्मनी के अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने यूएस ओपन 2026 के एकल वर्ग के सेमीफाइनल में जगह बना ली है। अंतिम चार में पहुंचने के बाद ज्वेरेव ने कहा है कि वह बेन शेल्टन को कार्लोस अल्काराज को हराते हुए देखने के लिए जगे रहे। एटीपी के मुताबिक, बोटिक वैन डे जैंडशुल्प पर सीधे सेटों में जीत के साथ आखिरी चार में पहुंचने के बाद ज्वेरेव ने कहा, “मैंने कल रात 3:30 बजे तक शेल्टन-अल्काराज का मैच देखा। मैं सोने नहीं गया। मैं देर तक जागा था।” शेल्टन ने आखिरकार दो बार के यूएस ओपन चैंपियन अल्काराज को 6-7(5), 6-1, 6-3, 1-6, 7-6(10-7) से हराया, और घरेलू दर्शकों के सामने एक यादगार प्रदर्शन किया। इस नतीजे से फ्रांसेस टियाफो के खिलाफ एक ऑल-अमेरिकन सेमीफाइनल तय हो गया। ज्वेरेव ने कहा, “बेन को श्रेय जाता है। उसने एक जबरदस्त मैच खेला। अब दो अमेरिकियों के बीच एक मजेदार सेमीफाइनल होने वाला है।” शेल्टन और टियाफो पहले सेमीफाइनल में मुकाबला करेंगे, वहीं ज्वेरेव फाइनल में जगह बनाने के लिए कैरेन खाचानोव का सामना करेंगे। ज्वेरेव बुधवार को वैन डे जैंडशुल्प को 6-2, 7-5, 6-1 से हराकर आखिरी चार में पहुंचे। वैन डे जैंडशुल्प के खिलाफ, ज्वेरेव ने दबाव बढ़ने पर अच्छा खेला। उन्होंने दूसरे सेट में 33-शॉट की रैली के बाद 2-3 पर एक ब्रेक पॉइंट बचाया और बाद में डच खिलाड़ी की फोरहैंड की गलती का फायदा उठाया जब उन्होंने 5-4 पर सेट पॉइंट बनाए रखा। इस जीत के साथ ही वह तीसरी बार यूएस ओपन के सेमीफाइनल में पहुंचे और 29 साल के इस खिलाड़ी का शानदार सीजन जारी रहा, जिन्होंने इस साल की शुरुआत में रोलैंड गैरोस में अपना पहला ग्रैंड स्लैम टाइटल जीता था। जर्मन खिलाड़ी ने 2026 में एटीपी टूर के सबसे ज्यादा मैच जीतने वाले खिलाड़ी के तौर पर भी अपनी जगह बना ली है। उनके नाम 51 जीत हैं। इस सीजन में उनकी 23 ग्रैंड स्लैम मैच जीत ने बोरिस बेकर के 1989 में बनाए गए 22 के पिछले जर्मन रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।
‘कर्नाटक की कांग्रेस सरकार लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम’, डीके शिवकुमार पर बोला भाजपा ने हमला

बेंगलुरु। कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और वरिष्ठ भाजपा नेता आर. अशोक ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सरकार के 100 दिनों के कार्यों और कांग्रेस पार्टी के जश्न पर सवाल उठाए। भाजपा नेता अशोक ने एक बयान में कहा कि उपलब्धि कहां है? सरकार किस बात का जश्न मना रही है? मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को शर्म आनी चाहिए। उन्होंने पूछा, “ऐसे जश्न का क्या मकसद है? आप किस उपलब्धि का जश्न मना रहे हैं? जब लोगों को दिखाने के लिए एक भी बड़ी उपलब्धि नहीं है, तो क्या यह जश्न नाकामियों को उपलब्धियों के तौर पर पेश करने के लिए है?” अशोक ने आरोप लगाया कि सरकार समाज के हर वर्ग के लोगों की उम्मीदों पर खरी उतरने में नाकाम रही है। महिलाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि ‘गृह लक्ष्मी योजना’ की लाभार्थियों को पैसों के लिए महीनों इंतजार करना पड़ रहा है और बार-बार सरकारी दफ्तरों व बैंकों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि युवाओं को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, जहां नौकरी पाने के लिए मेरिट से अधिक भ्रष्टाचार और रिश्वत अहम हो गई है। शिक्षा के मुद्दे पर अशोक ने दावा किया कि छात्रों को समय पर किताबें नहीं मिल रही हैं। कई स्कूलों में क्लासरूम की छतें टपक रही हैं और वे जर्जर हालत में हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि छात्रों को दिए गए घटिया क्वालिटी के जूते और मोजे एक दिन में ही खराब हो रहे हैं। सूखे की स्थिति को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए भाजपा नेता ने कहा कि फसल के नुकसान का सामना कर रहे किसानों को न तो सूखे से निपटने के लिए पर्याप्त मदद मिली और न ही सरकार से कोई उचित प्रतिक्रिया। अशोक ने यह भी आरोप लगाया कि बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों के लिए पेंशन सहायता कम कर दी गई है, जबकि मध्यम वर्ग जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतों और टैक्स के बोझ तले दबा हुआ है। राज्य की राजधानी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बेंगलुरु में सड़कें गड्ढों से भरी पड़ी हैं और सड़कों के किनारे कचरा पड़ा है। अशोक ने कहा, “आपने ‘ब्रांड बेंगलुरु’ की बात की थी, लेकिन असल में आपने ‘ब्रोकन बेंगलुरु’ (टूटा-फूटा बेंगलुरु) दिया है।” यह सवाल उठाते हुए कि क्या इन्हें सरकार के पहले 100 दिनों की उपलब्धियां माना जा सकता है, अशोक ने कहा कि लोग अंधेरे में जी रहे हैं, जबकि सरकार के जश्न का आयोजन स्थल जगमगा रहा है। उन्होंने कहा, “कर्नाटक को विकास की रोशनी चाहिए। आपने जो दिया है, वह तो सिर्फ स्टेज की चकाचौंध है।” उन्होंने आरोप लगाया कि युवाओं को नौकरी चाहिए थी, लेकिन उन्हें सिर्फ विज्ञापन दिए गए, किसानों को मुआवजा चाहिए था लेकिन उन्हें सिर्फ सम्मेलन दिए गए और महिलाओं को समय पर आर्थिक मदद चाहिए थी लेकिन उन्हें सिर्फ पब्लिसिटी इवेंट दिए गए। अशोक ने आगे आरोप लगाया कि सरकार अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए शानदार लाइटिंग और पब्लिसिटी का सहारा ले रही है। उन्होंने कहा, “आप अपनी उपलब्धियां नहीं दिखा पाए, इसलिए सजावट दिखा रहे हैं। आप विकास नहीं दिखा पाए, इसलिए लाइटिंग दिखा रहे हैं। आप अच्छा शासन नहीं दिखा पाए, इसलिए फिजूलखर्ची दिखा रहे हैं।” मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर निशाना साधते हुए भाजपा नेता अशोक ने कहा, “कर्नाटक में रोशनी नहीं आई, लेकिन आपके स्टेज पर जरूर आ गई। लोगों की जिंदगी नहीं बदली, लेकिन आपका पब्लिसिटी कैंपेन जरूर चमक उठा।
पश्चिम बंगाल: ‘एक राज्य, एक शिक्षा’ नीति लागू करने की तैयारी, विधानसभा में पेश होगा विधेयक

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा में गुरुवार को एक दिवसीय विशेष सत्र में शिक्षा से संबंधित एक महत्वपूर्ण विधेयक पेश किया जाएगा। पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय प्रशासन एवं विनियमन (संशोधन) विधेयक 2026 का उद्देश्य राज्य में “एक राज्य, एक शिक्षा” नीति को लागू करना है। राज्य मंत्रिमंडल ने विधेयक को मंजूरी दे दी है। सदन में पेश होने और पारित होने के बाद इसे राज्यपाल आर. एन रवि के कार्यालय में सहमति के लिए भेजा जाएगा, जिसके बाद यह अधिनियम बन जाएगा। विधेयक में शामिल प्रमुख प्रस्तावों की व्याख्या करते हुए राज्य के उच्च शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि इसमें विभिन्न राज्य संचालित विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और गैर शिक्षण कर्मचारियों के तबादलों से संबंधित दिशानिर्देश निर्दिष्ट किए जाएंगे। राज्य के उच्च शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने बताया, “विधेयक में कोलकाता या अन्य बड़े शहरों के पुराने सरकारी विश्वविद्यालयों में लंबे समय से पढ़ा रहे शिक्षकों को नए विश्वविद्यालयों में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव है। यह नीति विभिन्न सरकारी विश्वविद्यालयों से जुड़े शैक्षणिक कर्मचारियों पर भी लागू होती है।” राज्य के शिक्षाविदों का मानना है कि इस प्रस्ताव से राज्य के शैक्षणिक जगत में बड़ा विवाद खड़ा हो सकता है। राज्य द्वारा संचालित विश्वविद्यालय मूलतः स्वायत्त निकाय हैं, इसलिए राज्य द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों के शिक्षक, अधिकारी या शिक्षाकर्मी सीधे तौर पर राज्य सरकार के कर्मचारी नहीं होते हैं। अतः स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या यह तबादला आपसी सहमति से होगा या शिक्षकों और शिक्षाकर्मियों का तबादला सरकार की इच्छा पर होगा। हालांकि इन सभी बातों का स्पष्टीकरण विधेयक के विधानसभा में पेश होने और पारित होने के बाद ही मिलेगा। अधिकारी ने बताया कि विधेयक में एक और महत्वपूर्ण प्रस्ताव आलिया विश्वविद्यालय को पश्चिम बंगाल उच्च शिक्षा विभाग के अधीन लाना है। अब तक आलिया विश्वविद्यालय पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग के अधिकार क्षेत्र में था। आलिया विश्वविद्यालय अधिनियम पश्चिम बंगाल विधानसभा में दिवंगत बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के कार्यकाल में 2007 में पारित किया गया था। यह 5 अप्रैल 2008 से प्रभावी हुआ। प्रशासन ने दावा किया है कि इस विधेयक का उद्देश्य मानव संसाधनों का संतुलित वितरण सुनिश्चित करना है और इसी कारण से यह कदम उठाया गया है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने दावा किया है कि राज्य के पुराने और पारंपरिक विश्वविद्यालयों में लंबे समय के अनुभव वाले शिक्षक और प्रशासनिक कर्मचारी हैं जिनका उपयोग किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा, “नए विश्वविद्यालयों में उस अनुभव का उपयोग करना आवश्यक है। यदि कुशल प्रोफेसर और कर्मचारी नए संस्थानों में जाते हैं, तो वहां शिक्षण, अनुसंधान और प्रशासनिक ढांचे की गुणवत्ता में तेजी से सुधार होगा। उच्च शिक्षा के समग्र संतुलन को बनाए रखने के लिए यह पहल की जा रही है।
33 साल बाद भी यादगार है जैकी श्रॉफ की फिल्म ‘गर्दिश’, एक्टर ने यूं मनाया जश्न

मुंबई। साल 1993 की रियलिस्टिक एक्शन ड्रामा फिल्म ‘गर्दिश’ ने रिलीज के 33 साल पूरे कर लिए हैं। इस मौके पर अभिनेता जैकी श्रॉफ ने सोशल मीडिया के जरिए फिल्म से जुड़ी यादों को फिर से ताजा किया। अभिनेता जैकी श्रॉफ ने इंस्टाग्राम स्टोरीज सेक्शन पर फिल्म के क्लिप्स का मोंटाज वीडियो पोस्ट किया, जिसके साथ उन्होंने लिखा, “फिल्म गर्दिश ने अपनी रिलीज के 33 साल पूरे कर लिए हैं।” अभिनेता ने अपनी इस पोस्ट में फिल्म से जुड़े कलाकारों को टैग भी किया। प्रियदर्शन के निर्देशन में बनी फिल्म मलयालम सुपरहिट फिल्म ‘किरीडम’ (1989) का रीमेक थी। इसमें जैकी श्रॉफ (शिव साठे), अमरीश पुरी (हवलदार पुरुषोत्तम साठे – शिव के पिता), डिंपल कपाड़िया (शांति), ऐश्वर्या (विद्या – मुख्य अभिनेत्री, जिनका यह बॉलीवुड डेब्यू था) और शम्मी कपूर ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं थी। इसमें अभिनेता मुकेश ऋषि ने खलनायक के रूप में अपनी शुरुआत की थी। यह फिल्म अपनी यथार्थवादी कहानी और मजबूत अभिनय के लिए जानी जाती है। फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन (साबु सिरिल) और सर्वश्रेष्ठ एक्शन (त्यागराजन) के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीते थे। फिल्म की कहानी शिव साठे (जैकी श्रॉफ) और उनके पिता पुरुषोत्तम साठे (अमरीश पुरी) के इर्द-गिर्द घूमती है। पुरुषोत्तम एक ईमानदार पुलिस कांस्टेबल हैं और चाहते हैं कि उनका बेटा पुलिस ऑफिसर बनकर समाज की सेवा करे लेकिन एक दिन अपने पिता को बचाने के लिए शिव को एक स्थानीय गुंडे से भिड़ना पड़ता है, जिसके बाद उसका पूरा जीवन बदल जाता है। हालात उसे अनचाहे में ही अपराध की दुनिया में धकेल देते हैं। फिल्म का संगीत दिग्गज संगीतकार आर.डी. बर्मन (राहुल देव बर्मन) ने दिया था और गीत जावेद अख्तर ने लिखे थे। इसके गाने काफी लोकप्रिय हुए थे। बताया जाता है कि यह फिल्म साल 1993 की नौवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी और जैकी श्रॉफ की एक बड़ी सोलो हिट फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म में जैकी श्रॉफ और अमरीश पुरी के अभिनय की बहुत तारीफ हुई थी। इसके गाने भी काफी लोकप्रिय हुए थे।
‘जेन-जी का जनादेश बदलेगा उत्तर प्रदेश’, सपा मुख्यालय के बाहर लगा नया पोस्ट

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। सभी पार्टियां अभी से अपनी-अपनी रणनीतियां बनाने में जुट गई हैं और इस बार सबका फोकस है युवा वोटरों यानी ‘जेन-जी’ पर। इस बीच गुरुवार को समाजवादी पार्टी मुख्यालय के बाहर लगाए गए एक पोस्टर ने नई चर्चा छेड़ दी है। समाजवादी पार्टी कार्यालय के बाहर एक बड़ा पोस्टर लगाया गया है, जिस पर लिखा है – “जेन-जी का जनादेश बदलेगा उत्तर प्रदेश।” जानकारी के अनुसार, सरोजिनी नगर विधानसभा से केशव प्रसाद रावत ने यह पोस्टर लगवाया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी की नजर अब नई पीढ़ी पर है। हाल ही में उन्होंने जेन-जी तक पहुंचने के लिए कॉलेज, यूनिवर्सिटी और हॉस्टल्स में दो हफ्ते के छात्र जागरूकता अभियान की बात कही है। दरअसल, बीते मंगलवार को पार्टी ऑफिस में समाजवादी छात्र सभा के लिए नई ड्रेस भी लॉन्च की गई। इस दौरान छात्रसभा के कार्यकर्ता नीली टीशर्ट, नीली जींस और लाल टोपी में नजर आए। अब यही ड्रेस समाजवादी छात्रसभा की ऑफिशल ड्रेस होगी। इस मौके पर अखिलेश यादव ने कहा, “नीला रंग युवाओं का रंग है, नई पीढ़ी का रंग है, बहुजन समाज का रंग है, अन्याय के खिलाफ लड़ाई का रंग है। नीला रंग बहुजन समाज के साथ आइडियॉलजी का भी है। नई पीढ़ी की नई सोच होती है।” अखिलेश यादव ने कहा कि पार्टी अब नई पीढ़ी के छात्रों और युवाओं से सीधे संवाद करने की तैयारी कर रही है। इसके तहत दो सप्ताह के छात्र जागरूकता अभियान की शुरुआत की जाएगी, जिसमें कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपस में जाकर युवाओं के मुद्दों को सुना और उठाया जाएगा। गौरतलब है कि सिर्फ समाजवादी पार्टी ही नहीं बल्कि कांग्रेस और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी उत्तर प्रदेश के युवाओं और जेन-जी वोटरों को साधने के लिए अलग-अलग अभियान चला रही हैं।
सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामला: केरल सरकार का सतर्क रुख, ईडी की मांग पर पहले होगा त्वरित सत्यापन

तिरुवनंतपुरम। केरल सरकार ने सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले में पूर्व मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन और अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज करने की प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की मांग पर सावधानीपूर्वक आगे बढ़ने का फैसला किया है। इसके साथ ही एफआईआर दर्ज करने से पहले सतर्कता विभाग द्वारा त्वरित सत्यापन किए जाने की संभावना है। केरल सरकार वर्तमान में विस्तृत कानूनी चर्चाओं में लगी हुई है और अंतिम निर्णय लेने से पहले औपचारिक कानूनी राय की उम्मीद कर रही है। ईडी ने सीएमआरएल-एक्सालॉजिक वित्तीय लेनदेन में अपनी जांच के निष्कर्षों के आधार पर विजयन और अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग की है। एजेंसी ने सहायक दस्तावेजों सहित 25 पृष्ठों की एक रिपोर्ट राज्य पुलिस प्रमुख रावड़ा ए चंद्रशेखर को सौंप दी है। सरकार की वर्तमान सोच यह है कि सतर्कता विभाग द्वारा प्रारंभिक जांच से यह पता चलेगा कि ईडी की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों का पर्याप्त तथ्यात्मक और साक्ष्य आधारित आधार है या नहीं। इसके बाद ही एफआईआर दर्ज करने पर विचार किया जाएगा। कानूनी हलकों ने बताया है कि यदि साक्ष्य से संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो एफआईआर दर्ज करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। हालांकि, सरकार इस बात को लेकर आशंकित है कि यदि स्वतंत्र प्रारंभिक सत्यापन के बिना एफआईआर दर्ज की जाती है तो इस कदम को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के तहत ईडी द्वारा दर्ज किए गए बयानों का साक्ष्य मूल्य एक प्रमुख मुद्दा है। ऐसा माना जा रहा है कि ईडी की वर्तमान सिफारिश काफी हद तक सीएमआरएल के मुख्य वित्तीय अधिकारी और ईडी मामले में आरोपी पी. सुरेश कुमार के बयान पर आधारित है। हालांकि पीएमएलए के तहत दर्ज किए गए बयान उस कानून के तहत कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में मूल्यवान होते हैं, लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि क्या किसी आरोपी का बयान स्वयं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सतर्कता मामले का आधार बन सकता है। इसलिए स्वतंत्र पुष्टिकारक साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ईडी ने सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले में अंतरिम निपटान बोर्ड के निष्कर्षों पर भी भरोसा किया है। बोर्ड ने पाया है कि सीएमआरएल ने टी. वीना के स्वामित्व वाली एक्सालॉजिक सॉल्यूशंस को इस आधार पर भुगतान किया था कि वह तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन की बेटी थीं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बोर्ड के निष्कर्षों को अभी तक कानूनी रूप से पलटा नहीं जा सका है, यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है। सीएमआरएल के शीर्ष अधिकारी ससिधरन कार्था और कथित भुगतानों में शामिल अन्य लोग भी भविष्य में होने वाली किसी भी सतर्कता जांच के दायरे में आ सकते हैं। सरकार केरल उच्च न्यायालय द्वारा कांग्रेस नेता मैथ्यू कुझलनादन की उस याचिका को खारिज करने के फैसले से भी अवगत है, जिसमें उन्होंने सीएमआरएल-एक्सालॉजिक लेनदेन की सतर्कता जांच की मांग की थी।
अमेरिका में बर्थराइट सिटिजनशिप पर बहस, रिपब्लिकन ने की सीमाएं लगाने की मांग

वॉशिंगटन। अमेरिका में अस्थायी वीजा पर रहने वाले लोगों के यहां पैदा हुए बच्चों की नागरिकता के अधिकार एक बार फिर बहस का विषय बन गए हैं। रिपब्लिकन सांसद इन अधिकारों पर कुछ सीमाएं लगाने की वकालत कर रहे हैं जबकि डेमोक्रेट्स का कहना है कि अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन के तहत जन्म लेते ही नागरिकता का अधिकार मिलता है। बर्थराइट सिटिजनशिप पर हुई प्रतिनिधि सभा की न्यायपालिका उपसमिति की सुनवाई के दौरान रिपब्लिकन नेताओं ने कांग्रेस से इस मुद्दे पर कार्रवाई करने की मांग की। वहीं डेमोक्रेट्स का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस संवैधानिक सवाल पर अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। उपसमिति के रिपब्लिकन अध्यक्ष चिप रॉय ने कहा कि कांग्रेस को संशोधन में इस्तेमाल किए गए वाक्यांश ‘उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन’ की स्पष्ट परिभाषा तय करनी चाहिए। रॉय ने कहा, “कांग्रेस की जिम्मेदारी है कि वह ‘उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन’ का मतलब स्पष्ट करे, जन्म के लिए अमेरिका आने की प्रवृत्ति को रोके और अमेरिकी नागरिक होने के मायने की गरिमा को बनाए रखे।” रॉय का तर्क था कि संशोधन का उद्देश्य यह नहीं था कि अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों या अस्थायी रूप से देश में आए लोगों के बच्चों को अपने आप अमेरिकी नागरिकता मिल जाए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 1898 के ‘वोंग किम आर्क’ मामले के फैसले पर गलत तरीके से भरोसा किया। उनके अनुसार, वह मामला ऐसे प्रवासियों के अमेरिका में जन्मे बच्चे से जुड़ा था, जो कानूनी रूप से और स्थायी रूप से अमेरिका में रह रहे थे। इमिग्रेशन अकाउंटेबिलिटी प्रोजेक्ट की सह-संस्थापक और नीति निदेशक रोजमेरी जेन्क्स ने समिति को बताया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला कांग्रेस को कार्रवाई करने से नहीं रोकता। उन्होंने कहा, “बारबरा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक कार्यकारी आदेश को रद्द किया था। इससे कांग्रेस की आव्रजन और नागरिकता से जुड़े मामलों पर संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते।” जेन्क्स ने कांग्रेस से आग्रह किया कि वह ‘इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट’ में संशोधन कर अवैध प्रवासियों और अस्थायी निवासियों के यहां जन्मे बच्चों के लिए कुछ अपवाद तय करे। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे अस्थायी वीजा धारकों के लिए नियम बनाए जाएं जो अपने अमेरिका में जन्मे बच्चों की ओर से सरकारी सहायता या कल्याणकारी लाभ लेना चाहते हैं। उनके अनुसार, ऐसे माता-पिता को किसी अमेरिकी नागरिक या कानूनी स्थायी निवासी को नामित करना चाहिए, जो बच्चे के लिए ये लाभ प्राप्त करे। जेन्क्स ने कहा, “अमेरिकी नागरिकता एक बेहद मूल्यवान अधिकार है। हमारी सरकार को इसकी पूरी तरह रक्षा करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नागरिकता केवल उन्हीं विदेशियों को दी जाए जिन्हें हमने कानूनी रूप से अमेरिकी समाज का स्थायी हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया है।” कंसास के अटॉर्नी जनरल क्रिस कोबैक ने भी कहा कि कांग्रेस के पास इस मुद्दे पर कानून बनाने का अधिकार अब भी मौजूद है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यापक कार्यकारी आदेश के खिलाफ फैसला दिया था, लेकिन उसने इस विषय पर बनने वाले हर संभावित कानून को असंवैधानिक नहीं बताया है। कोबाच का कहना था कि यदि जन्म के उद्देश्य से अमेरिका आने (बर्थ टूरिज्म) से जुड़े मामलों पर कोई सीमित और विशेष कानून बनाया जाए, तो अदालत में उसका परिणाम अलग हो सकता है। डेमोक्रेट सांसदों ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उपसमिति की वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य मैरी गे स्कैनलोन ने कहा कि अमेरिका में जन्मे वे बच्चे, जिनके माता-पिता अवैध प्रवासी हैं या वीजा पर रह रहे हैं, 14वें संशोधन के तहत संरक्षण प्राप्त करते हैं। स्कैनलोन ने कहा, “अवैध प्रवासियों के अमेरिकी बच्चे और वीजा धारकों के अमेरिकी बच्चे, दोनों ही ऐसे व्यक्ति हैं जिनका जन्म अमेरिका में हुआ है।” उन्होंने कहा कि जन्म के समय से ही वे अमेरिकी कानून के अधीन होते हैं और उन्हें ‘उस पारस्परिक संबंध से जुड़े अधिकारों, जिम्मेदारियों और सुरक्षा का स्पष्ट संवैधानिक दावा प्राप्त है।