पंच बद्री में से एक है श्री ध्यान बद्री मंदिर, जहां ध्यान मुद्रा में विराजमान हैं भगवान विष्णु

उत्तराखंड। उत्तराखंड की शांत वादियों में प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ गहरी आध्यात्मिक शांति महसूस होती है। इसी पवित्र धरती पर भगवान विष्णु को समर्पित पंच बद्री में से एक है-श्री ध्यान बद्री मंदिर। यहां भगवान विष्णु की काले पत्थर की चार हाथों वाली मूर्ति ध्यान की मुद्रा में स्थापित है। योगध्यान बद्री मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर उत्तराखंड के सात पूजनीय सप्त बद्री मंदिरों में से एक है। जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच पांडुकेश्वर में स्थित यह मंदिर शांत वातावरण और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाना जाता है, जिसका आनंद और भगवान के दर्शन करने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु आते हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार को सभी श्रद्धालुओं को मंदिर का भ्रमण करने के लिए कहा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो पोस्ट कर लिखा, “चमोली में मौजूद श्री ध्यान बद्री मंदिर, भगवान विष्णु को समर्पित एक पुरानी और पवित्र जगह है। यह मंदिर पंच बद्री में से एक है। यहां भगवान विष्णु का ध्यान करने वाला रूप भक्तों को बहुत ज्यादा शांति और आध्यात्मिक अनुभव देता है। चमोली आने पर इस पवित्र मंदिर के दर्शन जरूर करें।” पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां भगवान विष्णु की प्रतिमा ध्यान मुद्रा में स्थापित है, जहां पांडवों के पिता राजा पांडु ने अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए कठिन तपस्या की थी। दरअसल, पांडवों के वंशज राजा पुरंजय के पुत्र उर्वरऋषि ने उर्गम घाटी में भगवान विष्णु की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु यहां प्रकट हुए। इस स्थान पर भगवान विष्णु की काले पत्थर से बनी चतुर्भुजी प्रतिमा ध्यान मुद्रा (पद्मासन) में स्थापित है। भगवान के इसी ध्यानमग्न स्वरूप के कारण इस पवित्र स्थल का नाम ‘ध्यान बद्री’ पड़ा। मुख्य बद्रीनाथ धाम की तुलना में यह स्थान बेहद शांत, एकांत और प्राकृतिक सुंदरता से घिरा हुआ है, जो ध्यान और साधना के लिए उत्तम माना जाता है। इसके पास ही प्रसिद्ध पंच केदार में से एक कल्पेश्वर महादेव मंदिर भी स्थित है।

27 सितंबर का पंचांग: पूर्वजों के निमित्त करें तर्पण और पिंडदान, शाम 4:45 बजे से 6:14 बजे तक राहुकाल

नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पंचांग का काफी महत्व होता है। कोई शुभ काम, यात्रा, निवेश या पूजा-पाठ करने से पहले पंचांग जरूर देखा जाता है। पंचांग हिंदू काल-गणना पद्धति है जो सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों की स्थिति पर आधारित है। 27 सितंबर 2026 को आश्विन माह के कृष्ण पक्ष प्रतिपदा तिथि रात 8:58 बजे तक रहेगा। इसके बाद द्वितीया शुरू हो जाएगी। रविवार सुबह 6:20 बजे सूर्योदय और शाम 5:14 बजे सूर्यास्त होगा। वहीं, शाम 6:35 चंद्रोदय और सुबह 7:38 बजे चंद्रास्त होगा। 27 सितंबर 2026 को मुख्य रूप से पितरों (पूर्वजों) के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाएगा। इस दिन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि (पहला श्राद्ध) है। इसके साथ ही इस दिन भगवान विष्णु और सूर्य देव की उपासना करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्य हस्त नक्षत्र में रहेगा। ज्योतिष के अनुसार, सूर्य के हस्त नक्षत्र में प्रवेश करने से सभी 12 राशियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। हस्त नक्षत्र के स्वामी चंद्रमा का सूर्य से मित्रता का संबंध माना गया है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, हस्त नक्षत्र तेरहवां नक्षत्र है, जिसका अर्थ ‘हाथ’ होता है। इस नक्षत्र के स्वामी चंद्रमा हैं और इसकी राशि कन्या है। रविवार सुबह 11:17 बजे तक वृद्धि योग रहेगा और उसके बाद ध्रुव योग शुरू हो जाएगा। पंचांग के अनुसार वृद्धि योग सत्ताईस (27) योगों में से 12वें नंबर का एक अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण योग माना जाता है। जब सूर्य और चंद्रमा की गतियों के बीच की ज्योतिषीय स्थिति (कुल देशांतर योग) 133 डिग्री 20 मिनट से 146 डिग्री 40 मिनट के बीच होती है, तब वृद्धि योग का निर्माण होता है। इस योग के मुख्य स्वामी सूर्य देव हैं। इस योग में जन्म लेने वाले जातक बहुत भाग्यशाली, दयालु, विनम्र और परोपकारी स्वभाव के होते हैं। इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:54 से दोपहर 12:41 बजे तक रहेगा। यह दिन का सबसे शुभ और फलदायी समय माना जाता है। आमतौर पर यह लगभग 48 मिनट (या दिनमान के अनुसार गणना किया गया आठवां मुहूर्त) होता है। माना जाता है कि इस मुहूर्त में किए गए कार्यों से सभी प्रकार के अशुभ प्रभाव या दोष स्वतः नष्ट हो जाते हैं। जब सूर्य ठीक सिर के ऊपर रहते हैं तब अभिजीत मुहूर्त की बेला होती है। रविवार को सुबह 6:25 से 7:59 बजे तक अमृत काल रहेगा। ज्योतिष और पंचांग के अनुसार, अमृतकाल एक अत्यंत शुभ, मंगलकारी और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर समयावधि (मुहूर्त) होता है। इसे अमृत के समान उत्तम फल देने वाला माना जाता है। इस दौरान किए गए कार्यों में सफलता की संभावना सबसे अधिक होती है। नए व्यापार, निवेश, पूजा-पाठ, और महत्वपूर्ण यात्रा के लिए यह समय श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन राहुकाल शाम 4:45 बजे से 6:14 बजे तक रहेगा। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार, राहुकाल दिन का वह समय होता है जिसे किसी भी नए या शुभ कार्य की शुरुआत के लिए अशुभ माना जाता है। राहुकाल को सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच के समय को 8 बराबर भागों में बांटकर निकाला जाता है, जो हर दिन लगभग 90 मिनट का होता है। स्थान बदलने के साथ इसके समय में भी बदलाव हो जाता है। इस दौरान कोई नया काम शुरू नहीं करना चाहिए, लेकिन जो काम पहले से चल रहे हैं, उन्हें जारी रखा जा सकता है। रविवार को गुलिक काल दोपहर 3:16 से शाम 4:45 बजे तक रहेगा। गुलिक काल को ‘विषैला समय’ भी कहा जाता है। यह एक उपग्रह है, इसको अशुभ माना जाता है। माना जाता है कि इस काल में किए गए कार्य नकारात्मक परिणाम देते हैं। इस काल में कोई नया काम शुरू करने से बचना चाहिए, लेकिन जो काम पहले से चल रहे हैं, उनको जारी रखा जा सकता है। जो काम बार-बार करना चाहते हैं तो इस काल में किया जा सकता है। बैंक में पैसे जमा करना, दान देना या निवेश करना इस काल में अच्छा माना जाता है। इस दिन यमगंड काल दोपहर 12:17 से 1:47 बजे तक रहेगा। यह समय मृत्यु के देवता यमराज से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस समय के दौरान स्वास्थ्य, दीर्घायु या सामान्य दुर्भाग्य से संबंधित बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। इस काल को नए कार्यों की शुरुआत के लिए अशुभ माना जाता है। नया व्यापार या नया काम शुरू करने से बचना चाहिए। इस दौरान किसी यात्रा पर भी निकलने से बचना चाहिए और पैसों के लेनदेन से भी बचना चाहिए। रविवार को सूर्य कन्या राशि में स्थित रहेंगे, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तो इसका प्रभाव व्यक्ति के जीवन, कामकाज और बौद्धिक क्षमता पर विशेष रूप से पड़ता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, इस दौरान व्यावहारिक और योजनाबद्ध तरीके से काम करना लाभकारी माना जाता है। इस दिन चंद्रमा मीन राशि में स्थित रहेगा। जब चंद्रमा मीन राशि में होता है तो व्यक्ति की भावनाओं, मन और स्वभाव पर बहुत गहरा असर डालता है। चंद्रमा को मन का कारक माना गया है और मीन एक जल राशि है, इसलिए यह स्थिति व्यक्ति को अत्यधिक संवेदनशील और भावुक बनाती है। रविवार को दिशाशूल पश्चिम दिशा में रहेगा। ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के अनुसार, दिशाशूल उस अशुभ दिशा को कहते हैं, जिसमें किसी खास दिन यात्रा करना या निकलना अशुभ माना जाता है।

पितरों की शांति के लिए देश के ये तीर्थ क्यों माने जाते हैं सबसे पवित्र?

नई दिल्ली। गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर स्थित शूलपाणेश्वर महादेव का तीर्थ केवल एक उपासना स्थल नहीं, बल्कि पापमुक्ति और आध्यात्मिक शुद्धिकरण का एक प्रमुख केंद्र है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब भगवान शिव ने अंधकासुर नामक दैत्य का वध किया, तो उनका अजेय अस्त्र त्रिशूल (शूल) दैत्य के दूषित रक्त से मलिन हो गया था। अपने अस्त्र को शुद्ध करने के उद्देश्य से महादेव ने संपूर्ण पृथ्वी का भ्रमण किया और नर्मदा के तट पर आकर अपने त्रिशूल को धरती में गाड़ दिया। ऐसा करते ही वहां से एक निर्मल और पवित्र जलधारा ने त्रिशूल को धोकर शुद्ध कर दिया। इसी पावन स्थल पर एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ, जिसे भगवान शिव ने स्वयं स्थापित किया और इसी कारण इसका नाम ‘शूलपाणेश्वर’ पड़ा। ऐतिहासिक रूप से यह स्थान पहले महाराष्ट्र की सीमा से लगे मणिबेली गांव में घने जंगलों और मनमोहक शूलपाणेश्वर झरने के बीच स्थित था। वर्ष 1994 में सरदार सरोवर बांध के निर्माण और जलस्तर बढ़ने के कारण यह मूल प्राचीन मंदिर और शिवलिंग जलमग्न हो गए। इसके पश्चात्, गुजरात सरकार द्वारा एकता नगर (केवडिया) के निकट गोरा ब्रिज के समीप एक ऊंचे स्थान पर नए शूलपाणेश्वर मंदिर का भव्य निर्माण किया गया। यह मान्यता है कि इस स्थान पर नर्मदा में स्नान करने और पितरों का तर्पण करने से मनुष्य के बड़े से बड़े पाप भी धुल जाते हैं, जो इसे पिंडदान के लिए एक अत्यंत पवित्र स्थल बनाता है। पितृ शांति की यात्रा में गुजरात के वडोदरा जिले के डभोई तालुका में स्थित चाणोद (जिसे चांदोद भी कहा जाता है) एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस पावन तीर्थ को इसकी भौगोलिक और आध्यात्मिक विशिष्टता के कारण ‘दक्षिणी प्रयाग’ की उपाधि दी गई है। यहां तीन पवित्र नदियों (नर्मदा, ओरसंग और गुप्त रूप से बहने वाली सरस्वती) का ‘त्रिवेणी संगम’ होता है। हिंदू धर्म में मृत्यु के उपरांत किए जाने वाले अंतिम संस्कारों, अस्थि विसर्जन और पिंडदान के लिए इसे देश के सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना गया है। चाणोद के घाटों का इतिहास भी इस स्थान को विशेष बनाता है। यहां के सबसे प्रसिद्ध ‘मल्हार राव घाट’ का निर्माण लगभग 1,000 वर्ष पूर्व हुआ था। ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, अहिल्याबाई होल्कर के ससुर मल्हार राव होल्कर के एक मंत्री ने राज्य के खजाने से भारी धन चुरा लिया था। जब यह धन एक पवित्र तुलसी के पौधे के नीचे से बरामद हुआ, तो राजा ने उस धन का उपयोग जनहित और धर्म के कार्य के लिए करते हुए इस विशाल घाट का निर्माण करवाया। इस 60 फीट चौड़े और 64 सीढ़ियों वाले घाट से श्रद्धालु नाव में बैठकर त्रिवेणी संगम के मध्य तक जाते हैं और अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान करते हैं। उत्तर और पश्चिम भारत से निकलकर यदि दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परंपराओं का विश्लेषण किया जाए, तो तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में स्थित श्रीरंगम का ‘अम्मा मंडपम’ घाट सर्वोच्च आस्था के रूप में उभरता है। कावेरी नदी के तट पर स्थित यह प्राचीन घाट हिंदू अनुष्ठानों, विशेषकर पितृ तर्पण और पिंडदान के लिए विश्व-स्तर पर प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में कावेरी नदी को अत्यंत पवित्र माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार ताई अमावस्या, महालय अमावस्या (पितृ पक्ष) और आदि अमावस्या के विशेष अवसरों पर अम्मा मंडपम पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। भक्तगण कावेरी नदी में डुबकी लगाते हैं और पुजारियों के वैदिक मार्गदर्शन में अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए ‘तर्पणम’ संपन्न करते हैं। इस क्षेत्र में यह गहरी मान्यता है कि पूर्वजों का तर्पण करने से लौकिक जीवन के कष्ट दूर होते हैं और पारिवारिक समृद्धि आती है। अम्मा मंडपम में यह पवित्र अनुष्ठान पूरा करने के पश्चात् ही श्रद्धालु भगवान श्रीरंगनाथ स्वामी के मुख्य मंदिर में दर्शन के लिए प्रस्थान करते हैं, जो मृत्यु और जीवन के बीच के संतुलन को दर्शाता है। भारत की मोक्ष यात्राओं का कोई भी आख्यान मध्य प्रदेश और गुजरात की जीवनरेखा नर्मदा के उल्लेख के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। स्कंद पुराण के ‘रेवा खंड’ सहित कई प्राचीन भारतीय ग्रंथों में नर्मदा को ‘रेवा’ या ‘रेवा’ के नाम से संबोधित किया गया है। वायु पुराण में नर्मदा की उत्पत्ति के रहस्य को स्पष्ट करते हुए इसे ‘पितरों की पुत्री’ बताया गया है, जो इस नदी की आध्यात्मिक महिमा को पिंडदान के संदर्भ में सर्वाधिक प्रासंगिक बना देता है। शास्त्रीय मान्यताओं में यह स्पष्ट उल्लेख है कि रेवा (नर्मदा) के तट पर किसी भी स्थान पर किया गया श्राद्ध, पितृ तर्पण और पिंडदान मनुष्य को ‘अक्षय’ (कभी नष्ट न होने वाला) पुण्य प्रदान करता है। अन्य नदियों के विपरीत, नर्मदा में केवल स्नान करने से ही नहीं, बल्कि इसके दर्शन मात्र से भी पापों का नाश माना गया है। नर्मदा के तल से प्राप्त होने वाले स्वयंभू ‘नर्मदेश्वर’ या ‘बाण लिंग’ की पूजा बिना किसी प्राण-प्रतिष्ठा के की जा सकती है, जो इस नदी की अद्वितीय प्राणिक ऊर्जा का प्रमाण है। पितृ पक्ष के दौरान अमरकंटक से लेकर भरूच तक फैले रेवा के विस्तृत तटों पर पिंडदान करने से पूर्वज तृप्त होते हैं और आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। शूलपाणेश्वर का ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक रहस्य, चाणोद का पवित्र त्रिवेणी संगम, श्रीरंगम में कावेरी नदी का अम्मा मंडपम, और रेवा (नर्मदा) की मोक्षदायिनी लहरें, ये सभी तीर्थस्थल मनुष्य को उसकी जड़ों और पूर्वजों से जोड़ते हैं।

मध्य प्रदेशः भारी बारिश से डिंडौरी में जनजीवन प्रभावित, स्कूल-आंगनबाड़ी बंद

डिंडौरी। मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले में पिछले दो दिनों से लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के चलते जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जिले की प्रमुख नदियां और नाले उफान पर हैं। भारी बारिश के कारण जबलपुर-अमरकंटक मार्ग बंद हो गया है। जोगी टिकरिया पुल के ऊपर से पानी बहने के कारण आवागमन रोक दिया गया है। वहीं जिला मुख्यालय का पुल भी पानी में डूबने की स्थिति में पहुंच गया है। जिला मुख्यालय से शहडोल मार्ग पर भी सुबह से आवागमन प्रभावित है। पुल के ऊपर पानी आने के कारण मार्ग बंद हो गया है। बजाग और करंजिया जनपद क्षेत्रों में भी भारी बारिश का असर देखने को मिल रहा है। इन क्षेत्रों के 100 से अधिक गांवों का संपर्क जनपद एवं जिला मुख्यालय से प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है। जिले के अमरकंटक, बजाग, करंजिया सहित ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार तेज बारिश हो रही है। नदी-नालों के उफान पर आने से कई ग्रामीण मार्गों पर आवागमन बाधित हो गया है। कुछ स्थानों पर पानी घरों में घुसने की स्थिति भी बनी हुई है। प्रशासन की ओर से लोगों से नदी-नालों और पुल-पुलियों के पास नहीं जाने की अपील की गई है। संवेदनशील घाटों पर पुलिस बल की तैनाती की जा रही है। वहीं, नर्मदा नदी के किनारे बसे लोगों को सुरक्षा की दृष्टि से प्रभावित क्षेत्रों को खाली करने के निर्देश दिए गए हैं। लगातार हो रही अत्यधिक वर्षा को देखते हुए कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया के निर्देश पर विद्यार्थियों और बच्चों की सुरक्षा के लिए 26 सितंबर को जिले के सभी शासकीय एवं अशासकीय विद्यालयों में एक दिन का अवकाश घोषित किया गया है। यह अवकाश नर्सरी से कक्षा 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए लागू रहेगा। इसके साथ ही सीबीएसई स्कूल, नवोदय विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय और अनुदान प्राप्त संस्थाओं में भी आज अवकाश रहेगा। जिले के सभी आंगनबाड़ी केंद्र भी 26 सितंबर को बंद रहेंगे। हालांकि शिक्षक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका और अन्य संबंधित कर्मचारी अपने कार्यस्थल पर उपस्थित रहेंगे। अत्यधिक बारिश और बिगड़े मौसम को देखते हुए शनिवार को करंजिया में आयोजित होने वाला जन विश्वास अभियान कैंप भी स्थगित कर दिया गया है। प्रशासन के अनुसार मौसम सामान्य होने के बाद कैंप के आयोजन की नई तिथि घोषित की जाएगी। भू-संसाधन प्रबंधन कार्यालय से प्राप्त दैनिक वर्षा के आंकड़ों के अनुसार, जिले में पिछले 24 घंटे में कुल 650.2 मिमी बारिश दर्ज की गई है। जिले की औसत वर्षा 92.9 मिमी रही। सबसे अधिक बारिश बजाग में 143.0 मिमी दर्ज की गई। इसके अलावा डिंडौरी में 93.2 मिमी, अमरपुर में 96.3 मिमी, समनापुर में 89.0 मिमी, करंजिया में 80.0 मिमी, शहपुरा में 64.4 मिमी और मेहदवानी में 84.3 मिमी बारिश दर्ज की गई। जिले की सामान्य औसत वार्षिक वर्षा 1404.8 मिमी है। इस वर्ष 1 जून से 26 सितंबर तक जिले में कुल 8236.1 मिमी वर्षा दर्ज की जा चुकी है, जिसका औसत 1176.6 मिमी है। दीर्घ सामान्य वर्षा की तुलना में जिले में अब तक 83.74 प्रतिशत वर्षा हो चुकी है। गत वर्ष इसी अवधि में औसतन 3.9 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। आंकड़ों के अनुसार गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष अब तक कुल वर्षा में 5.83 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। लगातार बारिश और नदी-नालों के बढ़ते जलस्तर को देखते हुए प्रशासन ने लोगों से विशेष सावधानी बरतने की अपील की है। लोगों को जलभराव वाले क्षेत्रों, नदी-नालों, पुल-पुलियों और घाटों के पास जाने से बचने की सलाह दी गई है। प्रशासन और पुलिस की टीमें संवेदनशील क्षेत्रों में स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।

पितृ पक्ष 2026: पूर्णिमा स्नान के लिए प्रयागराज में संगम घाटों पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

प्रयागराज। सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। पितृपक्ष को केवल शहद और तर्पण का समय नहीं माना जाता, बल्कि अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता जताने का अवसर भी है। मान्यता है कि इस दौरान किए गए तर्पण पिंडदान श्राद्ध और दान से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। और उनका आशीर्वाद परिवार पर सदा बना हुआ रहता है। वही आज से शुरू हो गया है पितृपक्ष और बड़ी संख्या में यात्री अपने पितृरों कातर्पण पिंडदान और श्राद्ध करने के लिए प्रयागराज में भरी भीड़ जुटने लगी है। हिंदू धर्म में प्रयागराज (त्रिवेणी संगम – गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती का मिलन स्थल) को पिंडदान और तर्पण के लिए अत्यंत पवित्र तीर्थ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मान्यता है कि त्रिवेणी संगम पर पिंडदान करने से दिवंगत आत्माओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है। तीर्थ पुरोहित अमरनाथ तिवारी ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि तीर्थों के राजा प्रयागराज में श्रद्धालु सर्वप्रथम पिंडदान और तर्पण करते हैं। यहां से श्रद्धालु काशी जाते हैं और फिर गयाजी जाते हैं। प्रयागराज में पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण के साथ-साथ मुंडन यहां होता है। आज से पितृ पक्ष की शुरुआत हो रही है। मध्य प्रदेश के सतना जिले से प्रयागराज पहुंचे एक व्यक्ति ने कहा कि हम पितरों का तर्पण करने के लिए यहां से गयाजी के लिए जाएंगे। अभी हम सभी संगम घाट पर पिंडदान करेंगे। इसके बाद अयोध्या के लिए जाएंगे। उन्होंने प्रयागराज का महत्व बताते हुए कहा कि ‘सारे तीर्थ बार-बार और संगम का तीर्थ एक बार’ है। यहां गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों नदियों का मिलन होता है। जब तीनों पंचांग के अनुसार, इस साल पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर, शनिवार से हो रही है। पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा। 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध, 27 को प्रतिपदा श्राद्ध, 28 को द्वितीया श्राद्ध, 29 को तृतीया श्राद्ध, 30 को चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध होगा। वहीं, अक्टूबर में 1 तारीख को षष्ठी श्राद्ध, 2 को सप्तमी श्राद्ध, 3 को अष्टमी श्राद्ध, 4 को नवमी श्राद्ध, 5 को दशमी श्राद्ध, 6 को एकादशी श्राद्ध, 7 को द्वादशी श्राद्ध, 8 त्रयोदशी श्राद्ध और 9 को चतुर्दशी श्राद्ध होगा। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष का आखिरी दिन होगा। इस दिन सर्वपितृ अमावस्या या महालय अमावस्या रहेगी। जिन पितरों की श्राद्ध तिथि मालूम नहीं है, उनके लिए इस दिन श्राद्ध करने की परंपरा है। किसी कारण से तय तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो, तब भी सर्वपितृ अमावस्या का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है।

पंजाब: पटियाला की चिटकारा यूनिवर्सिटी में ‘भूत’ की अफवाह के बाद मचा हंगामा, पुलिस वाहन में भी तोड़फोड़

पटियाला। पंजाब के राजपुरा में स्थित चिटकारा यूनिवर्सिटी में ‘भूत’ की अफवाह के बाद शुक्रवार देर रात हंगामा मच गया। सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद माहौल बेहद तनावपूर्ण रहा। यूनिवर्सिटी के सैकड़ों छात्र सड़कों पर उतर आए और कैंपस में जमकर हंगामा करते हुए तोड़फोड़ की। फिलहाल, पटियाला पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। छात्रों का दावा था कि कैंपस में पहले किसी लड़की ने आत्महत्या की थी और उसका ‘भूत’ अब हॉस्टल के कमरों में रहने वाले छात्रों को परेशान कर रहा है। हालांकि, मौके पर मौजूद सुरक्षा गार्डों और यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ अधिकारियों ने छात्रों को समझाने का प्रयास किया कि यहां ऐसी कोई आत्महत्या की घटना नहीं हुई है। प्रशासन के मुताबिक, कुछ शरारती छात्र जानबूझकर दूसरे छात्रों के कमरों के दरवाजे खटखटाकर वहां से भाग जाते हैं। हालांकि, छात्र प्रशासन की इस दलील को मानने के लिए तैयार नहीं हुए और यूनिवर्सिटी प्रबंधन के खिलाफ जोरदार नारेबाजी करते रहे। मामला बढ़ता देख थाना बनूड़, थाना सदर राजपुरा और थाना सिटी राजपुरा से भारी पुलिस बल मौके पर पहुंचा। पुलिस की ओर से छात्रों को शांत करने और स्थिति नियंत्रित करने का प्रयास किए जाने के दौरान माहौल और बिगड़ गया। आरोप है कि छात्रों ने पुलिस टीम के साथ हाथापाई की और पुलिस की एक गाड़ी में तोड़फोड़ कर दी। इस दौरान छात्रों की ओर से केएसएम चौकी (सिटी राजपुरा) के इंचार्ज अजय कुमार के साथ भी कथित तौर पर मारपीट किए जाने की जानकारी सामने आई। छात्रों ने आरोप लगाया कि चौकी इंचार्ज ने शराब पी रखी थी। इसके बाद यूनिवर्सिटी की लैब में ही उनका मेडिकल परीक्षण करवाया गया। आखिरकार पुलिस और यूनिवर्सिटी प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित करते हुए छात्रों को भरोसा दिया कि रात के समय दरवाजे खटखटाने की घटनाओं की सीसीटीवी के माध्यम से बारीकी से जांच की जाएगी। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इस मामले में जो भी शरारती तत्व संलिप्त पाया गया, उसके खिलाफ सख्त कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों के इस आश्वासन के बाद छात्र शांत हुए और अपने-अपने हॉस्टल की ओर लौट गए। फिलहाल इलाके में स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है। डीएसपी सुखदेव सिंह ने कहा ने कहा कि चिटकारा यूनिवर्सिटी में दो छात्राओं के लापता होने की अफवाह और किसी छात्रा का नाम या पहचान सामने नहीं आई। डीएसपी ने कहा कि अभिभावकों और सभी संबंधित लोगों की जानकारी के लिए स्पष्ट करना चाहते हैं कि आज चिटकारा यूनिवर्सिटी में कुछ छात्रों की ओर से दो लड़कियों के लापता होने की बात कही गई थी। इस संबंध में सोशल मीडिया पर भी पोस्ट सामने आई थी। उन्होंने बताया कि मामले को गंभीरता से लेते हुए स्थानीय एसएचओ गुरसेवक सिंह, डीएसपी बनूड़ और यूनिवर्सिटी प्रशासन के साथ पुलिस टीम ने छात्रों से बातचीत की तथा उनकी शिकायतें भी ली हैं। डीएसपी ने कहा कि फिलहाल किसी भी छात्र को यह जानकारी नहीं है कि कौन-सी दो लड़कियां कथित तौर पर लापता हैं। किसी छात्रा का नाम या पहचान भी सामने नहीं आई है। प्रथम दृष्टया यह बात अफवाह के तौर पर सामने आई है। उन्होंने कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने छात्रों की शिकायत दर्ज कर ली है और पूरे मामले की जांच की जाएगी। प्रत्येक छात्र से जानकारी लेकर सत्यापन किया जाएगा। यदि कोई छात्रा वास्तव में लापता पाई जाती है तो उसकी भी पूरी जांच कर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। डीएसपी सुखदेव सिंह ने अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि चिटकारा यूनिवर्सिटी में स्थिति पूरी तरह शांतिपूर्ण है और सभी बच्चे सुरक्षित हैं। किसी को डरने या चिंता करने की जरूरत नहीं है। पुलिस मौके पर मौजूद है और सुरक्षा व्यवस्था का पूरा ध्यान रखा जा रहा है।

माता अमृतानंदमयीः 9 साल में छोड़ा स्कूल, त्याग और सेवा से जीता दुनिया का दिल

नई दिल्ली। आध्यात्मिक गुरु और मानवतावादी नेता माता अमृतानंदमयी देवी को दुनिया भर में ‘अम्मा’ के नाम से जाना जाता है। 27 सितंबर 1953 को केरल में जन्मी प्रेम और करुणा की प्रतिमूर्ति माता अमृतानंदमयी ने अपने आलिंगन से लाखों लोगों को शांति का संदेश दिया है, इसलिए उन्हें ‘हगिंग संत’ भी कहा जाता है। मछुआरा परिवार में जन्मी सुधामणि इदमन्नेल से ‘अम्मा’ बनने तक का उनका सफर त्याग और सेवा का प्रतीक है। उनके द्वारा स्थापित माता अमृतानंदमयी मठ आज शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा राहत के क्षेत्र में विश्वभर में सेवा कार्य कर रहा है। माता अमृतानंदमयी देवी का जन्म केरल के छोटे से गांव अलप्पढ़ में हुआ था। जब वे नौ वर्ष की थीं, तब उनकी माताजी बीमार पड़ गईं और माता अमृतानानंदमयी को घर के कामों और अपने सात भाई-बहनों की देखभाल में मदद करने के लिए स्कूल से निकाल लिया गया। जब वे अपने परिवार की गायों के लिए पड़ोसियों से बचा हुआ अनाज इकट्ठा करने के लिए घर-घर जाती थीं, तो उन्हें अपने समुदाय और उससे परे की दुनिया में व्याप्त घोर गरीबी और पीड़ा का सामना करना पड़ा। जहां भी माता अमृतानानंदमयी जरूरतमंद लोगों से मिलती थीं, वे उन्हें अपने घर से भोजन और वस्त्र देती थीं। ऐसा करने पर परिवार से मिलने वाली डांट और सजा से वे विचलित नहीं हुईं। वे लोगों को उनके दुख में सांत्वना देने के लिए सहज रूप से गले लगाने लगीं। उनके स्नेहपूर्ण देखभाल के फलस्वरूप, लोग उन्हें अम्मा (मां) कहने लगे। जबकि उस समय एक 14 वर्ष की कन्या को पुरुष समेत किसी को भी स्पर्श करने की आज्ञा नहीं दी जाती थी। अपने माता-पिता से विपरीत प्रतिक्रियाएं मिलने के बावजूद भी अम्मा ऐसा ही करती रहीं। अम्मा का कहना है, “मै यह नहीं देखती कि वह एक स्त्री है या पुरुष। मैं किसी को भी स्वयं से भिन्न रूप में नहीं देखती। मुझसे संसार की सभी रचनाओं की ओर एक निरंतर प्रेम धारा बहती है। यह मेरा जन्मजात स्वभाव है। एक चिकित्सक का कर्तव्य रोगियों का उपचार करना होता है। इसी प्रकार मेरा कर्तव्य उन लोगों को सांत्वना देना है जो कष्ट में हैं। माता-पिता द्वारा विवाह के अनेकों प्रयासों के बावजूद भी अम्मा ने विवाह नहीं किया। 1981 में जब अनेकों जिज्ञासु पर्यकडवु में आकर अम्मा के शिष्य बनने के लिए उनके माता-पिता की संपत्ति में रहने लगे तो एक विश्वस्तरीय संगठन, माता अमृतानंदमयी मठ की स्थापना की गई। आज माता अमृतानंदमयी मठ अनेकों आध्यात्मिक और धर्मार्थ गतिविधियों में संलग्न है। 1987 में अपने श्रद्धालुओं के अनुरोध पर अम्मा विश्व के सभी देशों में कार्यक्रम आयोजित करती हैं। अम्मा का दर्शन अपने आप में अनूठा है। अम्मा सभी दर्शनार्थियों को गले लगाती हैं, अपने कंधे पर सिर रखकर उन्हें आश्वासन देती हैं। चाहे भीड़ हजारों की हो या लाखों की, अम्मा सभी को दर्शन देने के बाद ही पीठम से उठती हैं। अम्मा के विश्वव्यापी धर्मार्थ मिशन में बेघर लोगों के लिए 100,000 घर, 3 अनाथ आश्रम और 2004 में भारतीय सागर में सुनामी जैसी आपदाओं से सामना होने की अवस्था में राहत-और-पुनर्वास, मुफ्त चिकित्सकीय देखभाल, विधवाओं और असमर्थ व्यक्तियों के लिए पेंशन, पर्यावरणीय सुरक्षा समूह, मलिन बस्तियों का नवीनीकरण, वृद्धों के लिए देखभाल केंद्र और गरीबों के लिए मुफ्त वस्त्र और भोजन आदि कार्यक्रम सम्मिलित हैं। अम्मा अपने भक्ति संगीत के लिए भी प्रसिद्ध हैं। उनके द्वारा गाये गए भजनों की 100 से अधिक रिकॉर्डिंग, 20 से भी अधिक भाषाओं में उपलब्ध हैं। उन्होंने कई भजनों की रचना की है। अम्मा के शिष्यों ने भक्तों और आध्यात्मिक अन्वेषणकर्ताओं के साथ उनके संवादों को लिपिबद्ध करके उनकी शिक्षाओं की लगभग एक दर्जन पुस्तकों का प्रकाशन किया है।

एशियन गेम्स: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और खेल मंत्री मांडविया ने मैराथन में सिल्वर जीतने वाले सावन बरवाल को दी बधाई

नई दिल्ली। भारत के सावन बरवाल ने एशियन गेम्स 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए पुरुष मैराथन में सिल्वर मेडल जीता। बरवाल के सिल्वर ने इवेंट में देश के मेडल जीतने का 44 साल का इंतजार समाप्त किया। बरवाल को उनकी उपलब्धि पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने बधाई दी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर लिखा, “एशियन गेम्स 2026 में पुरुषों की मैराथन में सिल्वर मेडल जीतने पर सावन बरवाल को मेरी तरफ से बहुत-बहुत बधाई। आपके शानदार प्रदर्शन ने चार दशकों के बाद एशियन गेम्स मैराथन पोडियम पर भारत की वापसी को चिह्नित किया है। यह शानदार उपलब्धि लंबी दूरी के धावकों की नई पीढ़ी को प्रेरित करे।” खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने एक्स पर बरवाल की जीत का वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, “भारत के लिए ऐतिहासिक सिल्वर। एशियन गेम्स मैराथन मेडल के लिए भारत का 44 साल का इंतजार खत्म करने पर सावन बरवाल को बधाई। उन्होंने पुरुषों की मैराथन में शानदार 2:11:37 का समय निकालकर नया नेशनल रिकॉर्ड बनाया। पूरे देश को इस ऐतिहासिक कामयाबी पर बहुत गर्व है।” भारतीय नेशनल रिकॉर्ड-होल्डर बरवाल नागोया में एक कड़े मुकाबले वाली रेस में मेडल की दौड़ में बने रहे और फिर 42.195 किलोमीटर के इवेंट में दूसरा स्थान हासिल किया। उनका सिल्वर मेडल 1982 के एडिशन के बाद भारत का पहला एशियन गेम्स मैराथन मेडल है और विदेशी धरती पर किसी भारतीय पुरुष का पहला मेडल है। बरवाल की इस कामयाबी से भारत के ऐतिहासिक एशियन गेम्स मैराथन मेडल की गिनती में चौथा मेडल जुड़ गया है। उनसे पहले छोटा सिंह ने 1951 के एशियन गेम्स में गोल्ड जीता था, जबकि सूरत सिंह माथुर ने उसी एडिशन में ब्रॉन्ज मेडल जीता था। होसुर कुक्कप्पा सीतारण ने 1982 एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया था। बरवाल ने 1982 के बाद पहली बार देश को मैराथन में पदक दिलवाया है।

पीएफ से जुड़ा अटका काम चुटकियों में निपटाएं, ईपीएफओ कैंप में मिलेगा हर समाधान

नई दिल्ली। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ‘निधि आपके निकट 2.0’ पहल के तहत 28 सितंबर को कैंप लगाने जा रहा है। इसका उद्देश्य सदस्यों के पीएफ से जुड़े अटके कामों और उससे जुड़े सवालों का तेजी से समाधान करना है। ईपीएफओ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर ‘निधि आपके निकट 2.0’ पहल की जानकारी दी। साथ ही, बताया कि इसके तहत ईपीएफओ 28 सितंबर को कैंप लगाने जा रहा है, जिसमें संगठन की योजनाओं, फायदों और सेवाओं के बारे में बताया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य ईपीएफओ की सेवाओं को सब्सक्राइबर के करीब पहुंचाना है, जिससे उन्हें पीएफ से जुड़े अटके कामों के लिए केवल ऑनलाइन प्रक्रिया पर निर्भर न रहना पड़े। पोस्ट में ईपीएफओ ने लिखा, “ईपीएफओ की योजनाओं और फायदों के बारे में जानने, अधिकारियों के साथ सेवाओं और प्रक्रियाओं को समझने और अपनी शिकायतों का तुरंत समाधान पाने के लिए 28 सितंबर 2026 को ‘निधि आपके निकट 2.0’ कैंप में जाएं।” ईपीएफओ की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, इस कैंप में अधिकारियों से आप अपनी समस्या को लेकर सीधे बातचीत कर पाएंगे। ऐसे में अगर आपका कोई कार्य ऑनलाइन नहीं हो पा रहा है या किसी विशेष स्थिति के कारण अटका हुआ है तो अधिकारियों के समझ आप अपनी बात को रख सकते हैं। ‘निधि आपके निकट 2.0’ के तहत लगाए जाने वाले कैंप की खास बात यह है कि इसमें शिकायतों के सुनने के साथ उनके तत्काल पर फोकस किया जाएगा। ऐसे में अगर आपकी कोई शिकायत लंबे समय से अटकी हुई है या किसी सेवा को लेकर परेशानी आ रही है तो आप उसे कैंप में संबंधित अधिकारी के समक्ष रख सकते हैं। हालांकि, यह मानना सही नहीं है कि हर समस्या का समाधान तत्काल कैंप में हो जाएगा, यह समस्या की प्रकृति पर भी निर्भर करता है। अगर आप ईपीएफओ सब्सक्राइबर हैं और पीएफ से जुड़ी किसी समस्या या शिकायत का सामना कर रहे हैं तो कैंप में जाने से पहले अपनी समस्या से जुड़े जरूरी दस्तावेज और उपलब्ध जानकारी साथ रखना उपयोगी रहेगा। इससे अधिकारियों के लिए आपके मामले को समझकर उसका समाधान करना आसान रहेगा।

पीएम मोदी और रक्षा मंत्री समेत अन्य नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जयंती पर दी श्रद्धांजलि

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अन्य नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की जयंती पर याद करते हुए श्रद्धांजलि दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पोस्ट में कहा, “पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में कई साल बिताए और पूरी निष्ठा के साथ देश की सेवा की।” रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक्स पर लिखा, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि। सार्वजनिक जीवन और भारत की प्रगति में उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।” केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक्स पर पोस्ट किया, “भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं विख्यात अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह की जयंती पर सादर नमन करता हूं!” असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक्स पोस्ट में कहा, “आज पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को उनकी जयंती पर याद कर रहा हूं। देश के लिए उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।” केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने एक्स पर लिखा, “भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं महान अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।” भाजपा नेता और उद्योगपति नवीन जिंदल ने एक्स पर लिखा, “डॉ. मनमोहन सिंह को उनकी जयंती पर याद करते हुए। उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी और दुनिया में देश को एक नई पहचान दिलाई। प्रधानमंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान संसद में सेवा करना और जिस शालीनता और गरिमा के साथ उन्होंने इस सर्वोच्च पद को संभाला, उससे सीखना मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। उनकी विनम्रता और ईमानदारी भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक मिसाल बनी हुई है।” डॉ. मनमोहन सिंह का नाम भारतीय इतिहास में एक ऐसे अर्थशास्त्री के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा जिन्होंने देश की आर्थिक प्रगति की मजबूत नींव रखी। 1991 में वित्त मंत्री के तौर पर डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था में अहम बदलावों का रास्ता तैयार किया। 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान, डॉ. मनमोहन सिंह ने भारत के लोगों के अधिकारों और अवसरों को बढ़ाने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, सूचना का अधिकार अधिनियम और शिक्षा का अधिकार अधिनियम जैसे अहम कानून और कार्यक्रम लागू किए।