शिवभक्तों की आस्था का केंद्र मणिमहेश कैलाश, रक्षाबंधन पर दिव्य रोशनी से जगमगाता है पर्वत

हिमाचल प्रदेश। हिमाचल प्रदेश कीअलौकिक वादियों में भगवान शिव का अलौकिक स्थान देखने को मिलता है। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में पीर पंजाल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच समुद्र तल से लगभग 13, 000 फीट ऊंचाई पर स्थित मणिमहेश कैलाश पर्वत तमाम भक्तों की आस्था का प्रतीक है। मान्यता है कि रक्षाबंधन के दिन साधु-संतों का पहला जत्था मणिमहेश में अपनी पूजा संपन्न करते हैं। पौराणिक परंपरा के अनुसार, रक्षाबंधन के पवित्र दिन पर साधु-संतों का पहला जत्था मणिमहेश यात्रा के लिए रवाना होता है और पवित्र स्नान व पूजन करता है। इसी दिन से औपचारिक तौर पर मणिमहेश यात्रा और वहां पर आयोजित मेले की शुरुआत होती है, जो आगे चलकर जन्माष्टमी और राधा अष्टमी तक चलती है। लोकमान्यताओं के अनुसार, रक्षाबंधन के सुबह के समय जब सूर्य देव की पहली किरण मणिमहेश कैलाश चोटी पर पड़ती है, तो उस पर एक अद्भुत प्रकाश दिखाई देता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस समय पर्वत से दिव्य प्रकाश (मणि) की झलक देखने को मिलती है। मणिमहेश झील के क्रिस्टल-क्लियर पानी में विशाल और बर्फ से ढके कैलाश पर्वत का प्रतिबिंब साफ झलकता है, जो किसी अनूठी दुनिया जैसा प्रतीत होता है। मणिमहेश यात्रा में छोटा स्नान और बड़ा स्नान दो मुख्य पवित्र तिथियां हैं जिन पर श्रद्धालु मणिमहेश झील में डुबकी लगाते हैं। छोटा स्नान हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (कृष्ण जन्माष्टमी) के दिन होता है। इस पवित्र स्नान के साथ ही आधिकारिक मणिमहेश यात्रा की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है। इस दिन भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के साथ-साथ भक्त मणिमहेश झील पहुंचकर अपनी यात्रा का पहला प्रमुख चरण पूरा करते हैं और कड़ाके की ठंड के बावजूद पवित्र डुबकी लगाते हैं। वहीं, बड़ा स्नान भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (राधा अष्टमी) के दिन होता है। यह मणिमहेश यात्रा का सबसे बड़ा और अंतिम मुख्य आकर्षण होता है, जिसके साथ ही आधिकारिक यात्रा का समापन होता है। हर साल इसकी तारीखें अलग-अलग होती हैं। इस यात्रा को लेकर एक परंपरा प्रचलित है, जिसे ‘छड़ी’ कहा जाता है। यह गूर चरपतनाथ जी की पवित्र छड़ी होती है जिसे श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर ले जाते हैं। इसी छड़ी यात्रा से मणिमहेश यात्रा की आधिकारिक शुरुआत मानी जाती है। यह यात्रा चंबा शहर के लक्ष्मी नारायण मंदिर और दशनामी अखाड़े से शुरू होती है। इस यात्रा में रंगबिरंगी छड़ी यात्रा निकलती है और पूरे रास्ते भगवान शिव के भजन-कीर्तन गाए जाते हैं। जब यह यात्रा मणिमहेश झील पर पहुंचती है, तो भरमौर के ब्राह्मण परिवार के राज पुरोहितों द्वारा पूरी रात पूजा-पाठ और अनुष्ठान किए जाते हैं। अगले दिन श्रद्धालु मणिमहेश झील में पवित्र स्नान (नौण) करते हैं और बाद में भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए पवित्र झील के तीन बार चक्कर लगाते हैं। मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने गौरी कुंड में स्नान किया था जबकि भगवान शिव ने शिव कलोत्री में स्नान किया था। इसलिए मणिमहेश झील में अंतिम डुबकी लगाने से पहले महिला श्रद्धालु गौरी कुंड में स्नान करती हैं, वहीं पुरुष श्रद्धालु शिव कलोत्री में स्नान करते हैं। मणिमहेश कैलाश पर्वत को लेकर मान्यता है कि यहां भोलेनाथ स्वयं निवास करते हैं और उनके मस्तक पर स्थित ‘मणि’ रूपी किरण आज भी भक्तों को अलौकिक अनुभूति करवाती है। मणिमहेश को भगवान शिव के पांच प्रमुख कैलाश स्थलों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि शिवशंकर ने पार्वती जी के साथ रहने के लिए मणिमहेश पर्वत की रचना की थी। इस स्थान पर शिव आज भी शिवलिंग के रूप में मौजूद है। जबकि माता पार्वती को यहां देवी गिरजा के रूप में जाना जाता है। मणिमहेश पर्वत पर शिव शाम व रात्रि के मध्यकाल में दर्शन देते हैं। सूर्यास्त के समय जब सूर्य की किरणें पर्वत के शिखर पर पड़ती हैं, तब पूरा दृश्य स्वर्णिम हो जाता है। यदि मौसम साफ रहे तो भक्त पर्वत की चोटी व उस पर विराजमान शिव को देख सकते हैं। कई लोगों का मानना है कि मणिमहेश पर्वत का शिखर अदृश्य है। ये हमेशा बादलों व बर्फ से ढका रहता है। ये चोटी महज उसी को दिख सकती है जो पूर्ण रूप से पाप मुक्त हो व सच्ची श्रद्धा से भोले भंडारी को याद कर रहा हो। मणिमहेश पर्वत की कुल ऊंचाई कितनी है इस बात का ठोस प्रमाण नहीं है। हालांकि, अभी तक इसको लेकर कोई सटीक जानकारी नहीं आई है। कैलाश की तरह मणिमहेश पर्वत पर भी चढ़ना नामुमकिन है। जो कोई भी यहां चढ़ने की कोशिश करता उसे कोई अदृश्य शक्ति रोक देती है। वर्ष 1968 में इंडो-जापान की एक टीम ने जिसका नेतृत्व नंदिनी पटेल कर रहीं थी इस पर्वत पर चढ़ाई की कोशिश की थी लेकिन वे असफल रहे।
यूपीआई भारत के डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुनिया में पहुंचा रहा; अब तक 11 देशों में हुआ ऑपरेशनल

नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्रियों ने यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) के 10 साल पूरे होने पर कहा कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच से शुरू हुई क्रांति है और यह अब भारत के डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुनिया में पहुंचा रहा है और अब तक 11 देशों में ऑपरेशनल हो चुका है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के ऑफिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर कहा कि यूपीआई अब दुनिया के 11 देशों में ऑपरेशनल हो चुका है, जिसमें फ्रांस, सिंगापुर, यूएई, ग्रीस और मॉरिशस जैसे देशों का नाम शामिल है। पोस्ट में आगे कहा गया कि भारत में आसान पेमेंट की सुविधा देने से लेकर सीमाओं के पार डिजिटल ट्रांजैक्शन को संभव बनाने तक, यूपीआई हमारे डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुनिया भर में पहुंचा रहा है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने एक्स पर कहा कि यूपीआई, प्रधानमंत्री मोदी की सोच से शुरू हुई एक क्रांति है और ‘डिजिटल इंडिया’ की एक झलक है। गोयल ने डिजिटल पेमेंट के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल का जिक्र करते हुए कहा कि “क्यूआर कोड प्लीज?” अब करोड़ों भारतीयों की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन गया है। वहीं, केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी भारत के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में आए बदलाव का श्रेय पीएम मोदी के नेतृत्व को दिया। पुरी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “पीएम नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में यूपीआई भारत की डिजिटल यात्रा में एक क्रांतिकारी ताकत बन गया है।” उन्होंने कहा कि यूपीआई ने पेमेंट को तेज, आसान, सुरक्षित और ज्यादा सुलभ बना दिया है, जिससे लाखों भारतीय वित्तीय भागीदारी के एक नए दौर में शामिल हो गए हैं। वहीं, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यूपीआई, इनोवेशन के जरिए भारत के बदलाव का सफर तय करने के पीएम मोदी के विजन का एक बेहतरीन उदाहरण है। यूपीआई के 10 वर्षों के दौरान, हमारे देश ने दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम दिया है और यह साबित किया है कि ‘डिजिटल इंडिया’ के जरिए हम लोगों को तेज, आसान और सुरक्षित इंटरफेस देकर उन्हें सशक्त बना सकते हैं। वित्त मंत्रालय के मुताबिक, यूपीआई पर वार्षिक लेनदेन की संख्या बीते एक दशक में 13,000 गुना बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 24,162 करोड़ हो गई है, जबकि वित्त वर्ष 2016-17 में इनकी संख्या 1.78 करोड़ थी।
मिसाइल निर्माण में बड़ी छलांग, भारतीय उद्योग बनाएंगे डीआरडीओ की विकसित मिसाइलें

नई दिल्ली। भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित सभी पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की टेक्नोलॉजी भारतीय उद्योगों को हस्तांतरित करने को मंजूरी दे दी है। इसके बाद योग्य भारतीय कंपनियां देश के भीतर ही इन मिसाइल प्रणालियों का उत्पादन कर सकेंगी। इस कदम से भारतीय सेनाओं की युद्धक तैयारी को बल मिलेगा। सेनाओं को समय पर आवश्यक मिसाइलों की आपूर्ति हो सकेगी। रक्षा मंत्रालय के इस फैसले को भारत के मिसाइल निर्माण क्षेत्र में अनुसंधान से उत्पादन तक की यात्रा को तेज करने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। रक्षा क्षेत्र में इस आत्मनिर्भरता का मतलब केवल हथियारों का देश में इस्तेमाल व रिसर्च करना नहीं, बल्कि उनका उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला भी देश के भीतर विकसित करना है। मिसाइल तकनीक के हस्तांतरण से घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, विदेशी निर्भरता कम करने और भारतीय रक्षा उद्योग को मजबूत बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। यानी डीआरडीओ द्वारा विकसित टेक्नोलॉजी से भारतीय उद्योग बड़े पैमाने पर मिसाइल का उत्पादन कर सकेंगे। दरअसल, अब तक उन्नत मिसाइल प्रणालियों के विकास में डीआरडीओ की प्रमुख भूमिका रही है। नई व्यवस्था के तहत डीआरडीओ द्वारा विकसित तकनीक को निर्धारित योग्यता, प्रमाणन और नियामकीय आवश्यकताओं को पूरा करने वाले भारतीय उद्योगों को हस्तांतरित किया जाएगा। इससे मिसाइल प्रणालियों के विकास और परीक्षण के बाद उन्हें औद्योगिक स्तर पर उत्पादन में बदलने की प्रक्रिया आसान होगी। यानी सरल शब्दों में कहें तो डीआरडीओ तकनीक विकसित करेगा और भारतीय उद्योग उस तकनीक को बड़े पैमाने पर उत्पादन में बदलने में अहम भूमिका निभाएगा। इस फैसले का एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारतीय रक्षा उद्योग में छोटी और मध्यम कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना भी है। मिसाइल निर्माण की पूरी आपूर्ति श्रृंखला में अलग-अलग प्रकार के उपकरण, कलपुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियां, सामग्री और अन्य तकनीकी घटकों की आवश्यकता होती है। ऐसे में भारतीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई के लिए भी नए अवसर पैदा होंगे। सरकार का उद्देश्य रक्षा उत्पादन के लिए एक ऐसा मजबूत घरेलू औद्योगिक आधार तैयार करना है, जिसमें बड़ी कंपनियों के साथ-साथ एमएसएमई और अन्य तकनीकी भागीदार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं। यह कदम ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत अपने रक्षा उत्पादन को लगातार बढ़ाने और देश को उन्नत सैन्य प्रणालियों के निर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस फैसले से डीआरडीओ की भूमिका भी और स्पष्ट होती है। संगठन अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों के अनुसंधान और विकास पर अधिक ध्यान दे सकेगा, जबकि प्रमाणित तकनीकों को उद्योग के माध्यम से उत्पादन के स्तर तक ले जाया जा सकेगा। इससे नई तकनीक विकसित करने और उसे सेना के लिए उपलब्ध कराने के बीच का समय कम करने में भी मदद मिल सकती है। रक्षा मंत्री की यह मंजूरी भारत के मिसाइल क्षेत्र में ‘डीआरडीओ की प्रयोगशाला से भारतीय कारखानों तक’ तकनीक पहुंचाने की दिशा में बड़ा कदम है। इससे न केवल स्वदेशी रक्षा उत्पादन को गति मिलने की उम्मीद है, बल्कि भारतीय कंपनियों, एमएसएमई और तकनीकी भागीदारों के लिए रक्षा क्षेत्र में भागीदारी के नए रास्ते भी खुलेंगे।