विश्व अंग दान दिवस : ‘जिंदगी के सफर में’ विराम से भी संभव जीवनदान…

नई दिल्ली। सांसें थम जाने के बाद भी अगर किसी इंसान के अंग किसी जरूरतमंद के शरीर में मौजूद रहें, तो यह इंसानियत की एक बड़ी मिसाल है। अगर कोई अंग दान करता है, तो यह कई परिवारों को मुस्कुराने का मौका दे सकता है। इसी संदेश के साथ हर साल 13 अगस्त को ‘विश्व अंगदान दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मकसद अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ उन तमाम मिथकों और गलतफहमियों को दूर करना भी है, जो किसी जरूरतमंद तक जीवन पहुंचने की राह में बाधा बनते हैं। अंगदान वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति की सहमति और निर्धारित कानूनी-चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत उसके स्वस्थ अंग या ऊतक किसी ऐसे मरीज को प्रत्यारोपित किए जाते हैं, जिसका संबंधित अंग काम नहीं कर रहा हो। परिस्थितियों के अनुसार जीवित व्यक्ति भी कुछ अंगों या अंग के हिस्से का दान कर सकता है, जबकि मृत्यु के बाद भी उपयुक्त अंगों और ऊतकों का दान संभव है। गुर्दा, हृदय, फेफड़े, आंखों समेत कई अंग गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को नया जीवन दे सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में एक दाता से प्राप्त अंगों और ऊतकों से कई लोगों की जिंदगी बचाने या उनके जीवन की गुणवत्ता बेहतर करने में मदद मिल सकती है। अक्सर कहा जाता है कि एक अंगदाता आठ लोगों तक की जान बचाने में योगदान दे सकता है, हालांकि वास्तविक संख्या दाता की चिकित्सकीय स्थिति और उपलब्ध अंगों पर निर्भर करती है। किडनी, लिवर, हृदय, फेफड़े जैसे महत्वपूर्ण अंगों के खराब हो जाने पर कई मरीजों के सामने प्रत्यारोपण ही जीवन बचाने का विकल्प रह जाता है। समस्या यह है कि जरूरतमंद मरीजों की संख्या और उपलब्ध अंगों के बीच बड़ा अंतर है। यही वजह है कि अंगदान के लिए स्वैच्छिक रूप से आगे आना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। केवल इच्छा जताना ही नहीं, बल्कि अपने परिवार को भी अपनी इच्छा के बारे में बताना जरूरी है, ताकि जरूरत पड़ने पर परिवार उस निर्णय को समझ सके और उसका सम्मान कर सके। भारत में सरकार और स्वास्थ्य संस्थाओं की ओर से अंगदान को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन देश में अंग और ऊतक दान तथा प्रत्यारोपण की व्यवस्था को समन्वित करने वाली महत्वपूर्ण संस्था है। अंगदान के संदर्भ में सड़क दुर्घटनाओं और गंभीर मस्तिष्क चोटों का भी विशेष महत्व है, क्योंकि कुछ मामलों में ब्रेनडेड के बाद व्यक्ति के स्वस्थ अंगों का दान संभव हो सकता है। ब्रेनडेड की स्थिति में चिकित्सकीय और कानूनी मानकों के अनुसार अंगदान की संभावना पैदा हो सकती है। यही वह क्षेत्र है, जहां जागरूकता, प्रशिक्षित चिकित्सा व्यवस्था और परिवार की सहमति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अंग प्रत्यारोपण का इतिहास इंसानी संवेदना और चिकित्सा विज्ञान के अद्भुत मेल की कहानी भी है। रोनाल्ड ली हेरिक ने वर्ष 1954 में अपने जुड़वां भाई रिचर्ड हेरिक को एक किडनी दान की थी। इस ऐतिहासिक प्रत्यारोपण को डॉक्टर जोसेफ मरे और उनकी टीम ने अंजाम दिया। यह सफल जीवित-दाता किडनी प्रत्यारोपण चिकित्सा इतिहास में मील का पत्थर बना। बाद में डॉ. जोसेफ मरे को अंग और कोशिका प्रत्यारोपण से संबंधित उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए 1990 में शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। 13 अगस्त को विश्व स्तर पर अंगदान के प्रति जागरूकता से जुड़ा दिवस मनाया जाता है। भारत ने अंगदान और प्रत्यारोपण के लिए कानूनी और संस्थागत व्यवस्था भी विकसित की है। अंगदान को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि इसके लिए केवल युवा और पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति ही पात्र होते हैं। वास्तविकता यह है कि अंगदान की उपयुक्तता व्यक्ति की उम्र से ज्यादा उसकी चिकित्सकीय स्थिति और संबंधित अंग की स्थिति पर निर्भर करती है। जीवित व्यक्ति कुछ परिस्थितियों में एक किडनी या लिवर के एक हिस्से का दान कर सकता है। मृत्यु के बाद भी उपयुक्त अंगों और ऊतकों का दान संभव हो सकता है। 18 वर्ष से कम उम्र के संभावित दाताओं के मामले में पंजीकरण और दान से जुड़े निर्णयों के लिए माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति आवश्यक होती है। अंगदान का संकल्प लेना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि व्यक्ति अपनी इच्छा के बारे में अपने परिवार को बताए। मृत्यु के बाद अंगदान की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। ऐसे में परिवार अगर पहले से व्यक्ति की इच्छा से परिचित हो, तो कठिन समय में निर्णय लेना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। अंगदान को लेकर समाज में कई तरह की गलत धारणाएं मौजूद हैं, उम्र को लेकर भ्रम, बीमारी को लेकर डर, धार्मिक मान्यताओं को लेकर आशंका या यह सोच कि अंगदान के बाद शरीर का सम्मान नहीं किया जाएगा। चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति ने इनमें से कई भ्रांतियों को चुनौती दी है। किसी व्यक्ति के अंगदान की उपयुक्तता का निर्णय चिकित्सकीय विशेषज्ञ संबंधित परिस्थितियों और अंगों की स्थिति के आधार पर करते हैं। इसलिए केवल किसी बीमारी, उम्र या पूर्व स्वास्थ्य समस्या के आधार पर खुद को संभावित दाता मानने से इनकार कर देना उचित नहीं है। भारत में प्रत्यारोपण की संख्या बढ़ रही है, लेकिन जरूरत और उपलब्धता के बीच अंतर अब भी बड़ी चुनौती है। हाल के वर्षों में देश में प्रत्यारोपण सुविधाओं और बुनियादी ढांचे में विस्तार हुआ है, फिर भी मृतक-दाता अंगदान की दर को और बढ़ाने की जरूरत बनी हुई है। इसके लिए लोगों को सिर्फ अंगदान के लिए प्रेरित करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सही जानकारी देना भी उतना ही जरूरी है। अंगदान का फैसला व्यक्तिगत है, लेकिन उसका प्रभाव सामाजिक और मानवीय होता है। जागरूकता, वैज्ञानिक सोच और परिवार से संवाद के जरिए प्रतीक्षा सूची में जिंदगी की उम्मीद लगाए बैठे अनेक मरीजों तक मदद पहुंचाई जा सकती है।

घुटनों, कूल्हों और रीढ़ को मजबूत बनाता है भद्रासन, बरतें ये सावधानियां

नई दिल्ली। प्राचीन काल से योग हमारी संस्कृत्ति का अभिन्न हिस्सा रहा है। योग के अनेकों आसनों में भद्रासन काफी महत्व रखता है। यह आसन देखने में जितना आसान लगता है, उतना ही शरीर के लिए फायदेमंद होता है। संस्कृत में ‘भद्र’ का अर्थ होता है ‘कल्याणकारी’ या ‘शुभ’। इसलिए इसे कल्याणकारी आसन भी कहा जाता है। यह आसन न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक शांति के लिए भी बहुत लाभकारी माना जाता है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अनुसार, यह आसन घुटनों, कूल्हों और रीढ़ की हड्डी को मजबूत करता है। यह मासिक धर्म की ऐंठन को कम करने, गुर्दे, और प्रोस्टेट के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में भी प्रभावी है। महिलाओं के लिए भद्रासन विशेष रूप से फायदेमंद है। गर्भवती महिलाओं के लिए यह आसन कूल्हों और जांघों की मांसपेशियों को मजबूत करता है, जिससे प्रसव आसान होता है। यह मासिक धर्म की तकलीफों को कम करने और तनाव को दूर करने में भी मदद करता है। ये आसन जांघों, घुटनों, टखनों और पेल्विस यानी कूल्हे के पास की मांसपेशियों को अच्छे से खींचता है, मजबूत बनाता है और लंबा करता है। रीढ़ की हड्डी सीधी करता है। इस आसन में आप अपने बैठने वाली हड्डियों को जमीन पर टिकाते हैं। इससे रीढ़ की हड्डी अपने आप लंबी और सीधी हो जाती है। इस आसन को करने से एकाग्रता बढ़ती है और दिमाग तेज होता है। सिरदर्द, कमर दर्द, आंखों की कमजोरी, अनिद्रा और हिचकी जैसी समस्याओं में भी राहत मिलती है। आयुष मंत्रालय के अनुसार इसको करने से पाचन तंत्र बेहतर होता है और कब्ज जैसी शारीरिक समस्या भी कम होती है। साथ ही भोजन अच्छे से पचता है और दिमाग तेज रहता है। सिरदर्द, कमर दर्द, अनिद्रा जैसी समस्याओं से निजात मिलती है। भद्रासन महिलाओं से लेकर हर उम्र के लोग कर सकते हैं, लेकिन योग विशेषज्ञ कुछ सावधानियां भी बरतने की सलाह देते हैं। वहीं, घुटने या कूल्हों में गंभीर दर्द हो तो डॉक्टर की सलाह लें। शुरुआत में ज्यादा जोर नहीं देना चाहिए और अभ्यास का समय धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।

विदेश मंत्री जयशंकर स्वतंत्रता दिवस समारोह से पहले ‘हर घर तिरंगा’ अभियान में हुए शामिल

नई दिल्ली। देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस से पहले ‘हर घर तिरंगा’ अभियान में देशभर से लोग जुड़ रहे हैं। इसी कड़ी में विदेश मंत्री एस जयशंकर भी गुरुवार को इस अभियान का हिस्सा बने। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने आवास पर लहराते राष्ट्रीय ध्वज के साथ एक तस्वीर ‘एक्स’ पर शेयर की। तस्वीर के साथ उन्होंने कैप्शन में लिखा “हर घर तिरंगा।” विदेश मंत्रालय ने भी जयशंकर की पोस्ट को रीशेयर करते हुए लिखा, “हर दिल में तिरंगा, हर घर में तिरंगा।” ‘हर घर तिरंगा’ अभियान आजादी का अमृत महोत्सव के तहत शुरू किया गया था। इसका मकसद नागरिकों को अपने घरों में राष्ट्रीय ध्वज लगाने और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराने के लिए प्रोत्साहित करना है। अभियान की सोच यह थी कि अब तक लोगों का राष्ट्रीय ध्वज से रिश्ता ज्यादा औपचारिक और संस्थागत रहा है। इसे व्यक्तिगत गर्व और सम्मान की अभिव्यक्ति बनाने के लिए लोगों को घर-घर तिरंगा लाने के लिए कहा गया। इससे तिरंगा देश से व्यक्तिगत जुड़ाव का प्रतीक बने और साथ ही राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता के प्रति सामूहिक संकल्प को भी दर्शाए। इस साल ‘हर घर तिरंगा 2026’ को ‘वंदे मातरम के 150 साल’ की भावना को समर्पित किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को देशवासियों से 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने और स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देने के लिए ‘हर घर तिरंगा’ अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की अपील की थी। इंस्टाग्राम रील में पीएम मोदी ने कहा था, “15 अगस्त को गौरव के साथ मनाएं, स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि दें, विकसित भारत का संकल्प लें। हर घर तिंरगा, घर घर तिंरगा, हर मन तिंरगा।” उन्होंने कैप्शन में लिखा था, “आइए, हर घर तिरंगा को हर घर का उत्सव बनाएं।” वहीं, ‘एक्स’ पर पीएम मोदी ने लिखा था, “हमारा तिरंगा हमारा गर्व है और देश के लिए हमेशा सर्वश्रेष्ठ देने की प्रेरणा का स्रोत है।” उन्होंने कहा था, “आइए ‘हर घर तिरंगा’ आंदोलन में उत्साह से भाग लें और विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने के अपने सामूहिक संकल्प को दोहराएं।

कैनेडियन ओपन: ब्रैंडन नाकाशिमा ने राफेल जोडार को हराकर फाइनल में जगह बनाई

मॉन्ट्रियल। ब्रैंडन नाकाशिमा ने अपने पहले एटीपी मास्टर्स 1000 फाइनल में जगह बना ली है। सेमीफाइनल में नाकाशिमा ने बेहतरीन फॉर्म में चल रहे स्पेन के राफेल जोडार को हराकर फाइनल में जगह बनाई। नाकाशिमा ने 7-6 (3), 6-4 से जीत दर्ज की। हार के साथ ही राफेल जोडार का राफेल नडाल के बाद कैनेडियन ओपन फाइनल में पहुंचने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बनने का सपना टूट गया। मुकाबले की बात करें, तो टाई-ब्रेक पर एक कड़ा शुरुआती सेट जीतने के बाद, नाकाशिमा ने दूसरे सेट में 5-4 पर सर्विस करते हुए चार ब्रेक पॉइंट बचाए। नाकाशिमा ने जोदार के शुरुआती दो सर्विस गेम में बिना कोई ब्रेकथ्रू किए छह ब्रेक पॉइंट हासिल किए। उन्होंने आसानी से सर्व बनाए रखा, इससे पहले कि जोदार को 4-4 पर ओपनर में नाकाशिमा की सर्व पर अपना एकमात्र मौका मिला। हालांकि, नाकाशिमा 0-30 से बच गए। टाईब्रेक में, जोदार के फोरहैंड से नेट में उनके विरोधी को 2-4 के लिए पहला मिनी-ब्रेक मिला। दूसरे सेट की शुरुआत में, नाकाशिमा ने एक चतुर हाफ-वॉली विनर बनाया और जोदार की दूसरी सर्व पर अटैक किया। जोडार ने फिर से सर्व गंवा दी और 0-2 पर बने रहे। नाकाशिमा ने फिर दो ब्रेक पॉइंट बचाए। जोडार ने बाद में फिर से पकड़ बनाए रखी, 2-4 पर एक और ब्रेक पॉइंट और 3-5 पर दो मैच पॉइंट बचाए, जिसमें से एक शानदार ड्रॉप शॉट से मिला। नाकाशिमा दो बार बुरी तरह चूकने के बाद 0-30 पर आ गए। जोडार ने उसे तब जाने दिया जब उसके बैकहैंड पासिंग शॉट ने नाकाशिमा को वॉली का मौका दिया। एक ब्रेक पॉइंट आया लेकिन नाकाशिमा ने सर्व को बाहर मार दिया। जोडार ने एक और मैच पॉइंट बचाया जब उसका बैकहैंड बेसलाइन को छू गया और 26-शॉट की रैली खत्म हुई और वह एक बार फिर बैकहैंड पासिंग शॉट के साथ लाइन पर टिका रहा। नाकाशिमा ने 28 विनर्स और 28 अनफोर्स्ड एरर्स के साथ मैच खत्म किया। 25 साल के खिलाड़ी, जो अपने पहले मास्टर्स 1000 सेमीफाइनल में खेल रहे थे, एटीपी लाइव रैंकिंग में 22वें नंबर पर हैं। शुक्रवार को एटीपी की ताजा रैंकिंग अपडेट में वह अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग हासिल कर सकते हैं।

तरुण तेजपाल को अवार्ड देने वाली कांग्रेस अब चुप क्यों : सुधांशु त्रिवेदी

नई दिल्ली। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने गुरुवार को भाजपा मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विवादास्पद पत्रिका ‘तहलका’ और कांग्रेस के बीच संबंधों पर सवाल उठाए। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा खंडपीठ के ताजा फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर चुप क्यों है। सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, “अभी हाल ही में विवादास्पद मैगजीन तहलका के एडिटर इन चीफ तरुण तेजपाल जी को बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा खंडपीठ के द्वारा 2013 के बलात्कार के एक आरोप में दोषी पाया गया और उन्हें 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।” उन्होंने कहा कि यह विषय आज इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इतने दिन बीत जाने के बाद भी कांग्रेस की तरफ से एक भी शब्द नहीं आया है। न किसी विपक्षी की तरफ से न अपने को नारी हितों के स्वयंभू अलंबरदार बताने वाले किसी भी संस्थान की तरफ से यह सुनाई पड़ा है। भाजपा प्रवक्ता ने कहा, “यह दर्शाता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो या नारी की प्रताड़ना हो, इस पर सोच कितनी एकांगी, एक पक्षी और पूर्वाग्रह ग्रस्त है।” सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, “यह संभवतः इसलिए है क्योंकि यह वही बिजनेस हाउस है जिसने 2001 में एक विचित्र प्रकार का स्टिंग ऑपरेशन किया था।” उन्होंने बताया कि जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने जस्टिस शैलेंदु नाथ फुकन की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया था तो स्टिंग करने वाले ग्रुप ने पूरे टेप्स को वेरीफाई करने के लिए देने से मना कर दिया था। इससे ज्यादा संदेह और नहीं उत्पन्न हो सकता। सुधांशु त्रिवेदी ने आरोप लगाया कि जब जांच आयोग की रिपोर्ट आ गई, तब तक सरकार बदल गई थी। कांग्रेस की सरकार ने उस जांच रिपोर्ट को सदन के पटल पर कभी नहीं रखा। भारतीय जनता पार्टी द्वारा बहुत विषय उठाने के बाद केवल उसकी समरी रिपोर्ट 41 पेज की सदन के पटल पर रखी गई और कभी रिपोर्ट रखी नहीं गई। सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस और तरुण तेजपाल के संबंधों पर सीधे सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “आज जब वह अपराधी सिद्ध हो चुके हैं तो मैं याद दिलाना चाहता हूं कि इनका और कांग्रेस का क्या संबंध है।” सुधांशु त्रिवेदी के अनुसार, “सोनिया गांधी, जो यूपीए के समय में सुप्रीम लीडर थीं। उन्होंने 25 से 27 दिसंबर 2004 को तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम साहब को पत्र लिखा कि साहब तहलका और इसके फाइनेंसर्स की किसी प्रकार की प्रताड़ना नहीं होनी चाहिए। उनके साथ सकारात्मक व्यवहार होना चाहिए। उनके साथ कोई अनफेयर ट्रीटमेंट नहीं होना चाहिए।” उन्होंने कहा, “2010 में तत्कालीन लॉ मिनिस्टर वीरप्पा मोइली ने इनको जर्नलिज्म में एक्सीलेंस का अवार्ड दिया।” सुधांशु त्रिवेदी ने ने सवाल किया, “आज कांग्रेस पार्टी से पूछना चाहते हैं कि आपकी सरकार ने जिसको एक्सीलेंस ऑफ जर्नलिज्म अवार्ड दिया, उसकी आज यह स्थिति है और आपके मुंह से एक शब्द नहीं निकल रहा है।” उन्होंने साल 2013 का हवाला देते हुए कहा, “दिग्विजय सिंह ने कहा कि इन्होंने एक बहुत शानदार काम किया कम्युनल फोर्सेस के अगेंस्ट फाइट करने में।” साथ ही 2021 का हवाला देते हुए कहा, “जब तरुण तेजपाल लोअर कोर्ट से बरी होने में सफल हो गए थे, तो उन्होंने कांग्रेस पार्टी को धन्यवाद दिया था कि उन्होंने इस रेप केस में उनकी बहुत मदद की।” सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, “अब मैं कांग्रेस पार्टी से पूछना चाहता हूं कि आप स्पष्ट रूप से बताएं कि आप दोनों के बीच में यह क्या संबंध था। मुझे लगता है इससे ज्यादा मीडिया और सरकारों को बदनाम करने का कोई प्रमाण भारत की राजनीति में नहीं हो सकता।” सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि आज की स्थिति में इसका रेलेवेंस यह है कि यह स्थापित होता है कि कांग्रेस पार्टी हमेशा से आपराधिक प्रवृत्ति के संदिग्ध लोगों को मीडिया में प्रयोग करके राष्ट्रवादी सरकारों के खिलाफ साजिश करती रहती है। इसलिए भाजपा का कांग्रेस से सवाल है, “कांग्रेस ने अभी तक इस पर जवाब क्यों नहीं दिया?” प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में उन्होंने शायराना अंदाज में कहा, “राष्ट्रवाद के महामेरु पर वार बहुत ही हल्का था और राष्ट्रवाद को रोकने को साजिशों का तहलका था।” उन्होंने कहा, “कांग्रेस आज पूरी तरीके से एक्सपोज हो गई है।

पीओके में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के खिलाफ बेल्जियम में कश्मीरी समुदाय ने निकाला

मार्च ब्रसेल्स। बेल्जियम में रहने वाले कश्मीरी समुदाय ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों की निंदा की गई। कश्मीरी समुदाय ने राजधानी ब्रसेल्स में यूरोपियन पार्लियामेंट से यूनाइटेड नेशंस के ऑफिस तक एक विरोध मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों ने बुधवार को पाकिस्तानी सेना के खिलाफ नारे लगाए गए और पीओके में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की ओर अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने की मांग की। इन उल्लंघनों में जरूरी सेवाओं पर रोक और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल का क्रूर इस्तेमाल शामिल है। प्रदर्शनकारियों ने पीओके में पाकिस्तानी अधिकारियों की ओर से की गई क्रूर कार्रवाई के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग की। इस हफ्ते की शुरुआत में पीओके स्थित मानवाधिकार दस्तावेजीकरण और निगरानी संस्था जम्मू-कश्मीर मानवाधिकार वेधशाला (जेकेएचआरओ) ने 5 जून से 5 अगस्त के बीच कब्जे वाले इलाके में बढ़ती अशांति के दौरान 93 नागरिकों की मौत दर्ज की। पिछले हफ्ते हजारों कश्मीरी प्रवासियों ने इटली के बोलोग्ना शहर में विरोध मार्च निकाला और पीओके में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना की क्रूरता की निंदा की। प्रदर्शनकारियों ने नागरिक समाज समूह ‘जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (जेएएसी) के साथ एकजुटता व्यक्त की और क्षेत्र में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के अभियानों को समाप्त करने की मांग की। जेएएसी ने सोशल मीडिया पर कहा कि इटली में कश्मीरियों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे पाकिस्तानी सेना द्वारा निहत्थे नागरिकों के ‘नरसंहार’ के खिलाफ आवाज उठाएं। उन्होंने कहा, “शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी केवल अपने बुनियादी अधिकारों की मांग कर रहे हैं।” हाल ही में, कई ब्रिटिश सांसदों ने सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान पीओके में नागरिकों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना की क्रूरता पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। ब्रिटिश लेबर पार्टी के सांसद लियाम बायरन ने कहा था कि पीओके में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ गोलीबारी की खबरें बेहद चिंताजनक हैं। पीओके में नागरिकों की हत्या को ‘त्रासदी’ बताते हुए एक अन्य ब्रिटिश सांसद अदनान हुसैन ने कहा कि पाकिस्तानी अधिकारियों की ओर से अत्यधिक या गैर-कानूनी बल के किसी भी इस्तेमाल की पूरी, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होनी चाहिए।

हल्द्वानी में खड़गे की रैली के बाद रामलीला मैदान में किया गया शुद्धिकरण यज्ञ

हल्द्वानी। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की 8 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में हुई ‘विजय शंखनाद रैली’ के बाद अब सियासत तेज हो गई है। रैली खत्म होने के बाद मैदान में शुद्धिकरण यज्ञ कराए जा रहे हैं। श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास के अध्यक्ष गिरीश पांडे और पंडित मोहन शास्त्री ने कहा कि रैली के बाद रामलीला मैदान में शुद्धिकरण हवन किया गया। उनका आरोप है कि रैली के दौरान धार्मिक नारों और टिप्पणियों से मैदान की पवित्रता प्रभावित हुई है। गिरीश पांडे ने कहा, “यह यज्ञ इस पवित्र स्थान की पवित्रता को बहाल करने के लिए किया गया था। यह यज्ञ ‘श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास’ की देखरेख में आयोजित किया जा रहा है। हिंदुओं की भावनाएं इसलिए आहत हुईं, क्योंकि मंच पर एक ऐसे व्यक्ति को जगह दी गई जो हिंदू संगठनों की तुलना सांपों से करता है और मुस्लिम समुदाय से उन्हें खत्म करने की अपील करता है।” पंडित मोहन शास्त्री ने कहा, “हम रामलीला मैदान में सद्बुद्धि के लिए यज्ञ कर रहे हैं। दो-तीन दिन पहले, धर्म-विरोधी तत्वों ने हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र के खिलाफ बयान दिए और हिंदू धर्म व उसके विनाश के बारे में बातें कहीं।” संगठन के सदस्यों ने खड़गे को सनातन और हिंदू संगठनों का विरोधी बताते हुए कहा कि जिस मैदान में रामलीला का मंचन होता है। वहां ऐसे व्यक्ति के आने के बाद मैदान का शुद्धिकरण किया जाना जरूरी था। संगठन ने खड़गे के पिछले कथित सनातन विरोधी बयानों को भी इसका आधार बताया। कांग्रेस की ‘विजय शंखनाद रैली’ में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हुए थे। रैली के बाद उनके जाने के बाद हुए इस यज्ञ को लेकर अब राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई है। श्री राम सेना का कहना है कि यह यज्ञ उस स्थान की पवित्रता को वापस लाने के लिए किया गया है, जहां धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। वहीं कांग्रेस इस कदम को राजनीतिक बताया रही है। फिलहाल हल्द्वानी के रामलीला मैदान में हुए इस शुद्धिकरण यज्ञ के बाद उत्तराखंड की राजनीति में बयानबाजी का दौर तेज हो गया है।

हल्द्वानी में कांग्रेस रैली के बाद ‘शुद्धिकरण’ पर भड़के खड़गे, बोले-धर्म के नाम पर हो रही राजनीति

हलद्वानी। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस की ‘विजय शंखनाद’ रैली के बाद रामलीला मैदान में हुए ‘शुद्धिकरण हवन’ को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा और हिंदू संगठनों पर निशाना साधा है। आठ अगस्त को आयोजित कांग्रेस की रैली को खड़गे ने संबोधित किया था। इसके बाद श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास की ओर से रामलीला मैदान में शुद्धि हवन किया गया। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस घटनाक्रम पर कहा कि कांग्रेस शुरू से कहती रही है कि देश में दलितों के लिए जगह नहीं है। धर्म के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश की जा रही है। खड़गे ने सवाल उठाया कि रामलीला मैदान सभी राजनीतिक दलों की जनसभाओं के लिए इस्तेमाल होता है, ऐसे में वहां हवन करने की जरूरत क्या थी? कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने कहा कि इस तरह का आयोजन सबसे पहले हिंदू धर्म के ही खिलाफ है। ऐसे कदम देश को बांटने और जातियों के बीच विवाद पैदा करने का काम करते हैं। खड़गे ने कहा कि यह बयान जनता को यह दिखाने के लिए दिया जा रहा है कि सरकार तैयार है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपना एजेंडा पूरा होने के बाद ही इस तरह की मांग कर रही है। उन्होंने कहा कि पहले इस संबंध में अन्य दलों से कभी चर्चा नहीं की गई और अब 19 दिन बर्बाद करने के बाद समय बढ़ाने की मांग की जा रही है। उन्होंने सरकार के रवैये को शर्मनाक बताते हुए कहा कि संसद का समय महत्वपूर्ण है और सभी दलों को साथ लेकर काम किया जाना चाहिए। खड़गे के इन बयानों के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तेज होने के संकेत हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर कहा, “कब, अब जब आज वंदे मातरम हो रहा है, जन गण मन हो रहा है। 19 दिन संसद चला और कम से कम 25-26 दिन आपके पास थे तो उस समय आपको ये याद नहीं आया। ये तो मैं समझाता हूं कि लोगों को बताने के लिए उनका ये बयान है। जब आपका एजेंडा पूरा हो गया तब आप तैयार होते हैं, सबके 19 दिन बर्बाद करने के बाद अब समय मांगते हैं। ये शर्म की बात है।

5 फ्लॉप फिल्मों के बाद पायलट बनना चाहते थे मोहनीश बहल, सलमान खान ने बचाया फिल्मी करियर

मुंबई। 1980 के दशक के मध्य में एक युवा अभिनेता अपनी लगातार पांच-छह फिल्मों के फ्लॉप होने के बाद इतना निराश हो चुका था कि उसने बॉलीवुड को हमेशा के लिए अलविदा कहने का मन बना लिया था। यह युवा अभिनेता कोई और नहीं, बल्कि मोहनीश बहल थे। फिल्मों में करियर खत्म मानकर उन्होंने विमानन क्षेत्र में जाने का फैसला किया और अपना कमर्शियल फ्लाइंग लाइसेंस प्राप्त करने की तैयारी शुरू कर दी, लेकिन एक दिन जिम में उनकी मुलाकात उभरते हुए अभिनेता सलमान खान से हुई, जो उनके अच्छे दोस्त बन गए। जब राजश्री प्रोडक्शंस की फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ (1989) के लिए कास्टिंग चल रही थी, तब सलमान खान ने ही खलनायक ‘जीवन’ के रोल के लिए मोहनीश बहल के नाम की सिफारिश की थी। इस एक अवसर ने उनके समाप्त हो चुके करियर को पुनर्जीवित कर दिया। मोहनीश बहल का जन्म 14 अगस्त 1961 को मुंबई में हुआ था। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बेहद समृद्ध रही है। उनकी मां, भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री नूतन थीं और उनके पिता लेफ्टिनेंट कमांडर रजनीश बहल थे। मोहनीश बहल की नानी शोभना समर्थ और मौसी तनुजा भी जानी-मानी अभिनेत्रियां थीं, जबकि काजोल उनकी चचेरी बहन हैं। उन्होंने 1983 में फिल्म ‘बेकरार’ से सह-अभिनेता के रूप में शुरुआत की, जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल रही। इसके बाद ‘तेरी बाहों में’ (1984) भी फ्लॉप रही। रामसे ब्रदर्स की हॉरर फिल्म ‘पुराना मंदिर’ (1984) हिट तो हुई, लेकिन उस दौर में हॉरर फिल्मों को ‘बी-ग्रेड’ सिनेमा माना जाता था, इसलिए इससे मोहनीश बहल के करियर को कोई खास फायदा नहीं हुआ। मोहनीश बहल अपनी किशोरावस्था के सभी दिल टूटने के किस्से अपनी मां से साझा करते थे और नूतन हमेशा उन्हें समझाती थीं कि समय बीत जाता है, जीवन कभी खत्म नहीं होता। ‘मैंने प्यार किया’ (1989) की ऐतिहासिक सफलता ने मोहनीश बहल को बॉलीवुड में स्थापित एक्टर बना दिया, लेकिन उनके करियर का असली टर्निंग पॉइंट तब आया जब राजश्री प्रोडक्शंस ने ही उनकी नकारात्मक छवि को तोड़कर उन्हें एक ‘संस्कारी और आदर्श भाई’ के रूप में पेश किया। ‘हम आपके हैं कौन’ (1994) और ‘हम साथ-साथ हैं’ (1999) ने उन्हें भारतीय परिवारों का चहेता बना दिया। बड़े पर्दे पर अपनी छाप छोड़ने के बाद मोहनीश बहल ने टेलीविजन की ओर रुख किया और वहां भी अपार सफलता प्राप्त की। 2002 में उन्होंने स्टार प्लस के बहुचर्चित मेडिकल ड्रामा ‘संजीवनी: अ मेडिकल बून’ में डॉ. शशांक गुप्ता की भूमिका निभाई। ‘संजीवनी’ भारतीय टेलीविजन पर एचआईवी और अन्य गंभीर चिकित्सा मुद्दों पर संवेदनशीलता से बात करने वाला पहला शो था। उन्हें 2003 में ‘इंडियन टेलीविजन एकेडमी’ (आईटीए) का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार दिलाया। बाद में उन्होंने ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ (2011) में डॉ. आशुतोष की भूमिका निभाई, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा, हालांकि लंबे और थका देने वाले शूटिंग शेड्यूल के कारण उन्हें पीठ में गंभीर दर्द की समस्या हो गई, जिसके चलते उन्हें बीच में ही यह शो छोड़ना पड़ा। 2019 में 17 साल बाद उन्होंने ‘संजीवनी 2’ के साथ उसी प्रतिष्ठित डॉ. शशांक के रूप में वापसी की, जिसने पुरानी यादों को एक बार फिर से ताजा कर दिया। निजी जीवन में, मोहनीश बहल ने 23 अप्रैल 1992 को अभिनेत्री एकता सोहिनी (आरती बहल) से विवाह किया। उनकी दो बेटियां हैं, जिनका नाम प्रनूतन और कृषा हैं। उनकी बड़ी बेटी प्रनूतन ने भी परिवार की विरासत को आगे बढ़ाते हुए 2019 में सलमान खान द्वारा निर्मित फिल्म ‘नोटबुक’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। मोहनीश बहल की आखिरी फिल्म साल 2019 में आई ‘पानीपत’ थी। इन दिनों वह अभिनय के बजाय अपने परिवार की प्रॉपर्टी और व्यावसायिक कामों को संभाल रहे हैं तथा अपनी निजी जिंदगी पर ध्यान दे रहे हैं।

सिर्फ नेटवर्किंग नहीं, अच्छा व्यवहार और ईमानदारी भी जरूरी: अंगद हसीजा

मुंबई। अभिनेता अंगद हसीजा इंडस्ट्री इन दिनों टीवी सीरियल ‘तुमसे तुम तक’ में नजर आ रहे हैं। अभिनेता का मानना है कि मनोरंजन जगत में आज के मुकाबले पहले मौके कम और कॉम्पटिशन ज्यादा था। उन्होंने कहा, “आज के समय में एक्टर्स और न्यूकर्म के पास ज्यादा मौके हैं, क्योंकि अगर आपको टीवी पर काम नहीं मिल रहा है, तो वेब सीरीज, अलग-अलग चैनल और प्लेटफॉर्म ट्राई कर सकते हैं। जब मैं इंडस्ट्री में आया था तो हमारे लिए ज्यादा मौके नहीं थे। बस कुछ ही बड़े चैनल हुआ करते थे और उनके शो बहुत सक्सेसफुल हुआ करते थे और उनमें काम मिलना मुश्किल था। अब बहुत ज्यादा ऑप्शन हैं, बहुत सारे चैनल और प्लेटफॉर्म हैं जो पहले नहीं थे। इसलिए, मैं कहूंगा कि एक्टर्स के लिए चीजें ज्यादा आसान हो गई हैं।” उन्होंने आगे कहा, “मैं यह नहीं कहूंगा कि एक एक्टर को स्ट्रगल नहीं करना पड़ता, लेकिन सबसे बड़ी चीज जिस पर मैं यकीन करता हूं, वह है किस्मत। अगर आपकी किस्मत आपके साथ है, तो आप कुछ भी कर सकते हैं।” अभिनेता ने बातचीत में बताया कि काम के साथ नेटवर्किंग भी जरूरी है। इसका मतलब ये नहीं कि सिर्फ नेटवर्किंग से ही काम मिलेगा। मुझे लगता है कि अगर आप एक अच्छे एक्टर हैं और अपने काम को लेकर ईमानदार हैं, लेकिन आपका व्यवहार भी मायने रखता है और यही आपको आगे लेकर जाएगा।” अभिनेता से आईएएनएस ने सवाल किया, “पहले निगेटिव लीड्स को अलग तरह से दिखाया जाता था और ऑडियंस सालों तक कैरेक्टर्स से जुड़ी रहती थी। क्या आपको लगता है कि आज के टेलीविजन ने उस तरह का कनेक्शन खो दिया है?” अभिनेता ने माना कि पहले शो चार या पांच साल तक चलते थे और उनसे जुड़े रहते थे। उन्होंने कहा, “जब आप इतने वर्षों तक हर दिन कुछ देखते हैं, तो वह आपकी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है, लेकिन अब टेलीविजन शो इतने लंबे समय तक नहीं चलते। बहुत कम शो चार या पांच साल तक चलते हैं, यही वजह है कि लोग शायद उनसे उसी तरह कनेक्ट न कर पाएं। साथ ही, मुझे लगता है कि यह एक अच्छी बात भी है क्योंकि दर्शकों को अलग-अलग तरह की कहानियां मिल रही हैं और एक्टर्स को अलग-अलग काम करने को मिल रहे हैं। नहीं तो, इतने सालों के बाद आप बोर हो सकते हैं। टेलीविजन समय के हिसाब से बदल रहा है।